शाहिद को सलामः ..खेलनी तो हॉकी है, जंग थोड़ी लड़नी है, ऐसे थे शाहिद
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मोहम्मद शाहिद मॉडर्न हॉकी के बेहतरीन ड्रिब्लर। आला इंसान। दोस्तों के दोस्त। एक ऐसा बेहतरीन खिलाड़ी की उनकी हॉकी की कलाकारी पर साथी तो साथी उनके प्रतिद्वंद्वी तक मुरीद हो जाए। मोहम्मद शाहिद से जो जितनी बार भी मिला उनके मुरीद होते चला गया।
बनारस नगरी के बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जिस तरह से भारत का हर खासोआम मुरीद था उतने ही हॉकी प्रेमी हमेशा शाहिद की हॉकी की कलाकारी के मुरीद रहे। शाहिद तो मेरे तो लगभग हमउम्र रहे। वह उ. प्र. स्पोटर्स हॉस्टल की देन हैं।
जैसे जैसे उनका हॉकी का करियर बढ़ा वैसे वैसे मैं भी बतौर खेल पत्रकार उनका मुरीद होता चला गया। 1984 के लॉस एंजेल्स ओलंपिक के लिए भारतीय हॉकी टीम का कैंप दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में लगा। तब मैंने शाहिद से देश के एक बड़े हिंदी अखबार के लिए पहला बड़ा इंटरव्यू किया।
इसमें शाहिद से ओलंपिक में भारत पर दबाव की बाबत पूछा तो वह अपने अलमस्त बनारसी अंदाज में बोले थे कि सामने दुनिया की कोई भी टीम हो डर कहे का, कोई जंग थोड़े लडनी है, खेलनी तो हॉकी ही है।
हॉकी मैदान पर शाहिद की ड्रिब्लिंग को देखने के लिए हॉकी मुरीद दुनिया के हर कोने में जुड़ते थे। वह गेंद को लेकर अकेले ही गेंद को ड्रिबल करते हुए डॉज कर चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, स्पेन, नीदरलैंड, इंग्लैंड की टीमों की मजबूत से मजबूत रक्षापंक्ति को छका देते थे।
शाहिद गोल करने के लिए हमेशा कलाइयों से तेजी से गेंद को फ्लिक या पुश करते थे। यह बहुत कम देखा कि कभी उन्होंने डी में पहुंच कर हिट लगाकर गोल किया हो। वह करीब एक दशक से ज्यादा तक भारत के लिए अंतर्राष्टï्रीय हॉकी खेले।
शाहिद की ड्रिब्लिंग से पंजाब से आने वाले हॉकी कोच हमेशा परेशान रहे। एक खास वर्ग के शाहिद के आलोचकों ने उन पर हमेशा यह आरोप लगाया कि वे बेवजह गेंद को ड्रिबल करते हैं। शाहिद से जब-जब इस बाबत मेरी चर्चा होती तो वह कहते मैं तो गेंद को तभी तक ड्रिबल करता हूं जब तक साथी खिलाड़ी गेंद को लेने नहीं पहुंचता।
वह कहते थे कि मेरा पास इतना तेज होता था कि अक्सर कई साथी खिलाड़ी रफ्तार से पिछड़ जाते थे। उन्होंने बराबर कहा कि ड्रिब्लिंग मेरी ताकत है लेकिन मैंने हमेशा इसका इस्तेमाल टीम की बेहतरी के लिए किया है।
दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन डिफेंस को डॉज देने वाले शाहिद बीमारी को डॉज नहीं दे पाए और बुधवार 56 बरस की उम्र में दुनिया को अलविदा कह कर चले गए। शाहिद उन विरले भारतीय हॉकी खिलाडिय़ों में से एक हैं, जिन्होंने घास के मैदान के साथ एस्ट्रो टर्फ पर बहुत ही कारगर ढंग से गेंद को ड्रिबल कर गोल करने के साथ अपने लंबे करियर में बराबर गोल करने के बेहतरीन मौके मिले।
पेनल्टी कॉर्नर दिलाना तो उनके हमेशा बाएं हाथ का खेल रहा। भारत की बदकिस्मती यह रही कि उनके जमाने में भारत के पास पेनल्टी कॉर्नर को भुनाने वाला आज की तरह कोई ड्रैग फ्लिकर नहीं था।
56 वर्षीय शाहिद ने हॉकी का शुरुआत पाठ बनारस से स्पोटर्स हॉस्टल आने के बाद पूर्व ओलंपियन मरहूम झमनलाल शर्मा से सीखा। शाहिद ने हमेशा झमन लाल जी को कोच साहब कर ही संबोधित किया। शाहिद के बनारस के साथ उनके सबसे बढिय़ा जोड़ीदार मोहम्मद नईम रहे। ये दोनों रेलवे के लिए बहुत साथ साथ खेले। भारतीय टीम में भी ये दोनों ढाका में एशिया कप में साथ खेले।
'अरे मियां आज तो बेगम से भी सुननी पड़ गई'
1989 में ग्वालियर में सीनियर राष्ट्रीय पुरुष हॉकी चैंपियनशिप में शाहिद भारतीय रेलवे के लिए खेले। तब रेलवे की टीम के कोच मौजूदा हॉकी चयनकर्ता पूर्व ओलंपियन हरबिंदर सिंह थे। तब रेलवे की टीम क्वॉर्टर फाइनल में ग्वालियर रामप्रकाश सिंह की अगुवाई में खेलने वाली उत्तर प्रदेश से हार गई ।
शाम को मैच के बाद शाहिद से मुलाकात हुई तो बोले, अरे भाई आज तो हद हो गई कि बेगम से भी सुनना पड़ गया। शाहिद ने कहा, बेगम (परवीन) बोली, क्या बड़े खिलाड़ी हो, मियां। आप तो भांजे (मोहम्मद नासिर) से भी हार गए। तब शाहिद के भांजे नासिर उत्तर प्रदेश की उस टीम में थे जिसमें रामप्रकाश सिंह सहित रेलवे के कई ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें टीम में जगह नहीं मिली थी।
मोहम्मद शाहिद की बाबत एक बात का जिक्र जरूर करना चाहूंगा। बनारस की गलियों में हॉकी खेल कर अपने हॉकी को निखारा। बनारस की पहचान गंगा तहजीब की है। शाहिद ने भारत के लिए खेलने उतरने पर हमेशा तिरंगे के लिए अपना सर्वश्रेष्ठï प्रदर्शन किया।
इस बात को इस तरह बयां किया जा सकता है कि वह बतौर फॉरवर्ड अरबी घोड़े की रफ्तार से गेंद लेकर दौड़ते और उसी तेजी से फ्लिक करते थे। अफसोस यह की साथी खिलाड़ी पिछड़ जाते थे।
पाक से हार पर घर पर नहीं बनाता था खाना
शाहिद के करीबी अक्सर यह जिक्र करते हैं कि भारत की टीम यदि पाकिस्तान से किसी मैच में हार जाती तो शाहिद की मां घर में खाना नहीं पकाती है। पाकिस्तान के खिलाफ शाहिद ने हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठï प्रदर्शन किया। पाकिस्तान के खिलाफ नतीजा चाहे जो भी रहा हो शाहिद का खुद का प्रदर्शन हमेशा लाजवाब रहा।
मैदान पर लेफ्ट इन शाहिद के सबसे बड़े कामयाब जोड़ीदार लेफ्ट आउट जफर इकबाल। जफर के साथ उनकी जुगलबंदी ऐसी थी कि दोनों को मालूम होता था कब किसे डॉज देकर गोल करना है। भारत की बदकिस्मती यह रही कि इन दोनों के वक्त भारत का केवल एक ही छोर चलता था। ऐसे में सभी प्रतिद्वंद्वी टीमें इन दोनों को घेरने की रणनीति अपनाती थी।
शाहिद जैसे ही गेंद को आगे लेकर बढ़ते तो खासतौर पर गोरे अंपायर उन्हें ऑफ साइड देकर उनके गोल नकारने में कसर नहीं छोड़ते। अब हॉकी में ऑफ साइड का नियम ही खत्म कर दिया गया है। शाहिद ने 1980में चैपियंस ट्रॉफी से भारत के लिए अपने अंतर्राष्ट्ररीय करियर का आगाज किया और 1990में पेइचिंग एशियाई खेल उनका भारत के लिए आखिरी टूर्नामेंट था।
उन्होंने भारत के लिए 167 मैच खेले और 66 गोल किए। 1990के पेइचिंग एशियाई खेल उनका भारत के लिए आखिरी टूर्नामेंट था। उन्होंने भारत के लिए 167 अंतर्राष्ट्ररीय मैच खेले और 66 गोल किए। यदि ऑफ साइड का नियम शाहिद के समय खत्म हो गया होता तो उन्होंने अंतर्राष्ट्ररीय हॉकी में कम से कम पांच सौ गोल किए होते।
लगातार तीन -1980, 1984 और 1988 में ओलंपिक में खेले। वह 1980में मास्को में उनके ही भारत की स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के अहम सदस्य थे। 1984 में भारत की टीम गलत अंपायरिंग फैसलों के कारण पांचवें स्थान पर रही थी।
1988 में सोल ओलंपिक में छठे स्थान पर रहने वाली तत्कालीन भारतीय टीम के कोच एमपी गणेश से उनकी नहीं बनी। शाहिद गेंद को लेकर ड्रिबल करके गोल करने में यकीन करते थे। गणेश चाहते थे वह गेंद को तुरंत पास दें।
शाहिद ने इसकेबावजूद उन्होंने गणेश को इज्जत दी। दद्दा ध्यानचंद, इनाम उर रहमान, दद्दा के मंझले बेटे अशोक कुमार सिंह और फिर मोहम्मद शाहिद। ये सभी भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के हॉकी के बेहतरीन ड्रिब्लर और अपने डॉज से दुनिया की मजबूत से मजबूत रक्षापंक्ति को भेदते रहे ।
इसी परंपरा की आखिरी कड़ी हैं धनराज थपिल्लै। इन सभी में ध्यानचंद को छोड़ कर सभी यह आरोप लगा कि वे गैलरी के लिए ज्यादा खेलते हैं। इस सभी ने अपनी इसी कलाकारी से दुनिया भर को अपना मुरीद बनाया और अपनी कलाकारी नहीं छोड़ी। भारत में हॉकी में बहुत कलाकार हुए हैं लेकिन ध्यानचंद के बाद शाहिद का सा दूसरा कलाकार शायद नहीं होगा। आखिर बस, शाहिद भाई बहुत याद आओगे।
बहुत याद आएगा हॉकी का यह जादूगर
गेंद पर गजब का कंट्रोल रखने वाले शाहिद से गेंद छीनना लगभग असंभव हुआ करता था। ऊपर से स्पीड उनके खेल में चार चांद लगा देती थी। मैदान के बाहर भी शाहिद जिंदादिल इंसान थे और साथियों का मन बहलाया करते थे। लखनऊ के हॉकी दिग्गजों ने हॉकी के इस सितारे से जुड़ी यादें ताजा की। पेश है एक रिपोर्ट।
‘बाजीगरी में मुझे भी भूल जाता था’
शाहिद मुझसे चार-पांच साल छोटा था। इसलिए जब भारतीय टीम में उनका चयन हुआ, तभी से सीनियर होने के नाते मेरी बहुत इज्जत करता था। लेफ्ट आउट की पोजीशन का प्लेयर होने के कारण शाहिद और मेरी जुगलबंदी खूब जमती थी, लेकिन जब वह नया टीम में शामिल हुआ, तो अपनी बाजीगरी में मुझे पास देना ही भूल जाता था।
टीम के अटैक के वक्त वे गोरों (यूरोपीय खिलाड़ियों) को छकाने में इतना मसरूफ हो जाता था कि मुझे उससे पास के लिए मैदान में चीखना तक पड़ता था, तक कहीं जाकर मुझे गेंद मिलती थी। हालांकि मैदान में उनकी मौजूदगी ही प्रतिद्वंद्वी टीमों के लिए परेशानी का सबब रहती थी।
अस्सी के दशक में पूरे विश्व में शाहिद के स्टिकवर्क का कोई सानी नहीं था। कैंप के दौरान वह सभी खिलाड़ियों को शायरी सुनाकर मन बहलाता था। ऐसे में जिंदादिल खिलाड़ी का असमय गुजर जाना दिल को दर्द देता है। सैयद अली (1976 ओलंपिक- तकरीबन 400 मैच- पोजीशन- लेफ्ट आउट)
‘जब हॉलैंड के कोच शाहिद के रिटायर होने पर हैरान रह गए’
शहिद और मैं लगभग एक उम्र के हैं और सालों तक साथ में देश के लिए हॉकी खेली है। मैच के पास मैं अक्सर देखता था कि शाहिद की पैंट और टीशर्ट फट जाती थी। दरअसल, यूरोपीय खिलाड़ी शाहिद से गेंद नहीं छीन पाते थे, तो झल्लाकर छीनाझपटी के दौरान उनकी पैंट और टीशर्ट को फाड़ देते थे। मैच खत्म होने के बाद शाहिद के कपड़े कई जगह से फट चुके होते थे।
मुझे अच्छी तरह से याद है वर्ष 1989 में शाहिद के रिटायर होने के बाद हमारी टीम हॉलैंड खेलने गई तो कोच से शाहिद के बारे में पूछा। हमने कहा कि वह तो रिटायर हो गया है। यह सुनकर कोच हैरत में पड़ गया और बोला कि अगर ऐसा खिलाड़ी हमारी टीम में होता तो उसे पांच साल और खिलाते, क्योंकि शाहिद की पेनाल्टी कार्नर बनाने की क्षमता सबसे अधिक है और हमारी टीम में बावलेंडर (पेनाल्टी कार्नर विशेषज्ञ) है। अच्छा हुआ वह यहां नहीं आया, नहीं तो हमारी टीम को जीतने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता।
सुजीत कुमार (1984 ओलंपिक- 250 मैच- पोजीशन-लेफ्ट हाफ)
‘मास्को में मिले स्वर्ण में शाहिद रहे सबसे अहम’
भारतीय हॉकी टीम को 1980 में मिले आखिरी ओलंपिक में मोहम्मद शाहिद के योगदान को भुलाना मुश्किल होगा। हालांकि उस वक्त जर्मनी, हालैंड और आस्ट्रेलिया जैसी तगड़ी टीमें नहीं खेल रही थी। बावजूद इसके लिए हमारा स्वर्ण जीतना संभव नहीं दिख रहा था।
ऐसे में शाहिद ने अपनी हॉकी का जादू चलाया और अपने दम पर देश को ओलंपिक स्वर्ण दिलाया। फाइनल में यूरोपियन चैंपियन स्पेन से तगड़ा मुकाबला हुआ, जिसमें हम शाहिद के कलात्मक हॉकी की बदौलत मुकाबला 4-3 से अपने नाम करने में सफल रहे।
शाहिद मुझसे उम्र में एक-दो साल छोटा था, लेकिन हमारी आपस में खूब बनती थी। शाहिद के पास अपनी टीम के लिए पेनाल्टी कार्नर बनाने की कला बेहतरीन थी, लेकिन उस वक्त हमारे पास कोई स्टार पेनाल्टी कार्नर विशेषज्ञ नहीं था। इसलिए टीम के तमाम पेनाल्टी कार्नर व्यर्थ हो जाते थे और शाहिद की मेहनत पर पानी फिर जाता था।
रवीन्द्र पाल सिंह (1980 और 1984 ओलंपिक, मैच 130, पोजीशन- सेंटर हाफ)
‘ठाकुर आज गोल मारने वाली हॉकी लाया हूं’
शाहिद भाई मेरे बड़े भाई जैसे थे। सीनियर होने के बावजूद वे मेरे साथ बेहद अपनेपन से पेश आते थे। इसलिए मुझे उनसे बात करने झिझक नहीं होती थी। मैच होने से अक्सर शाहिद भाई मुझसे खूब मजाक करते थे।
अगर सामने वाली टीम तगड़ी होती थी तो बोलते थे कि ‘ठाकुर’ आज मैं गोल मारने वाली हॉकी लाया हूं और जब सामने कमजोर टीम होती थी, तो बोलते थे कि ‘ठाकुर’ आज डॉज (छकाने) देने वाली हॉकी लाया हूं। वर्ष 1988 में पाकिस्तान दौरे में गई टीम में शाहिद के साथ मैच में उतरा।
पहले हाफ में हमारी टीम पाकिस्तान से 0-1 से पीछे चल रही थी। हॉफ टाइम के दौरान शाहिद मुझसे बोले कि ठाकुर, मैंने हॉकी बदल ली है और गोल करने वाली हॉकी निकालकर ले आया हूं। तुम बस क्रास दो, गोल मैं कर दूंगा। मैच के अंतिम क्षणों में ठीक वैसा ही हुआ और मेरे पास पर शाहिद ने गोल करते हुए मुकाबला 1-1 से ड्रॉ करा दिया। मेरे विचार ऐसे ऐसा फारवर्ड दोबारा देख पाना असंभव है।
आरपी सिंह (दो वर्ल्ड कप- 170 मैच- पोजीशन-लेफ्ट हाफ)