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Paris Olympics 2024: शिक्षक पिता के कड़े संघर्ष के बाद स्वप्निल ने हासिल किया ओलंपिक पदक का मुकाम, पढ़ें कहानी

Thu, 01 Aug 2024 11:01 PM IST
Mayank Tripathi स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, पेरिस Published by: Mayank Tripathi Updated Thu, 01 Aug 2024 11:01 PM IST
सार

2014 एशियाई खेलों के दौरान एक दिन स्वप्निल का फोन आया कि उनके पास तैयारियों के लिए गोलियां नहीं हैं। उनकी जेब में सिर्फ सौ रुपये हैं। सुरेश बताते हैं कि उस दौरान उनके पास भी इतना पैसा नहीं था कि वे स्वप्निल की गोलियां खरीद पाते, लेकिन उन्होंने दोस्तों से 30 हजार रुपये उधार लेकर स्वप्निल को गोलियां दिलवाईं।

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Paris Olympics 2024: After the hard struggle of teacher father, Swapnil achieved the status of Olympic medal
स्वप्निल कुसाले - फोटो : PTI

विस्तार

स्वप्निल कुसाले के पिता सुरेश कुसाले की खुशी की कोई सीमा नहीं है। वह यही कहते हैं, उनका संघर्ष सफल हो गया। स्वप्निल के पिता को वह हर दिन याद आ रहा है, जब उन्होंने बेटे की शूटिंग के लिए बैंक से लोन लिया और दोस्तों से कर्ज उठाया, लेकिन उन्होंने स्वप्निल की शूटिंग में कोई बाधा नहीं आने दी। एक दिन वह भी था जब 2012 में स्वप्निल को अपना पहला अंतरराष्ट्रीय कंपटीशन खेलने के लिए जर्मनी जाना था, लेकिन उनके पास बेटे को भेजने के लिए पैसा नहीं था। उन्होंने हार नहीं मानी और बैंक से डेढ़ लाख रुपये का लोन लेकर स्वप्निल को जर्मनी में कंपटीशन खेलने के लिए भेजा।
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Paris Olympics 2024: After the hard struggle of teacher father, Swapnil achieved the status of Olympic medal
स्वप्निल कुसाले - फोटो : PTI
2015 तक करना पड़ा संघर्ष
सुरेश बताते हैं कि स्वप्निल के 2015 में रेलवे ज्वाइन करने से पहले तक उन्हें काफी दिक्कत आई। 2014 एशियाई खेलों के दौरान एक दिन स्वप्निल का फोन आया कि उनके पास तैयारियों के लिए गोलियां नहीं हैं। उनकी जेब में सिर्फ सौ रुपये हैं। सुरेश बताते हैं कि उस दौरान उनके पास भी इतना पैसा नहीं था कि वे स्वप्निल की गोलियां खरीद पाते, लेकिन उन्होंने दोस्तों से 30 हजार रुपये उधार लेकर स्वप्निल को गोलियां दिलवाईं।
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Paris Olympics 2024: After the hard struggle of teacher father, Swapnil achieved the status of Olympic medal
स्वप्निल कुसाले - फोटो : @ddsportschannel
साइकिलिंग और शूटिंग में एक खेल चुनना था
सुरेश बताते हैं कि स्वप्निल जब कक्षा आठ में थे तब राज्य सरकार की स्कीम क्रीड़ा प्रबोधिनी के लिए उनका चयन हुआ। पूना में उनके समक्ष साइकिलिंग और शूटिंग को अपनाने का विकल्प रखा गया। कोच ने स्वप्निल को राइफल देकर 10 निशाने लगवाए, जिसमें नौ निशाने लक्ष्य पर थे। इसके बाद उन्होंने शूटिंग को अपना लिया।
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