दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में शुमार माउंट एवरेस्ट और माउंट किलिमंजारो (अफ्रीका) को फतह करने वाली 17 वर्षीय शिवांगी पाठक पर आज पूरे देश को गर्व है। सबसे कम उम्र में माउंट एवरेस्ट चढ़ने वाली भारत की इस युवा पर्वतारोही ने 5,895 मीटर ऊंचे किलिमंजारो को सिर्फ 34 घंटों में पार कर लिया।
अमर उजाला एक्सक्लूसिव: 'एवरेस्ट रिकॉर्ड गर्ल' शिवांगी पाठक के संघर्ष की कहानी, जानें खुद उनकी जुबानी
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कैसे आया पर्वतारोही बनने का विचार ?
जिस उम्र में बच्चों को खेलने-खाने और शरारतें करने से फुर्सत नहीं मिलती, उस उम्र में विशालकाय पर्वतों से मोहब्बत करने का जुनून हर किसी में पैदा नहीं होता। शिवांगी ने बताया, 'यह जज्बा मेरे अंदर मेरी मां आरती पाठक ने पैदा किया। उन्होंने मुझे हमेशा दूसरों से अलग रास्ता अपनाने की सलाह दी। उनकी सलाह, दुआ और मेहनत से ही आज मैं खुद को इतना काबिल बना पाई हूं कि लोग मुझे 'ईगल ऑफ माउंटेन' कहने लगे हैं।'
शिवांगी आगे बताती हैं, 'एक दिन इंसपिरेशनल डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद मां ने मुझसे कहा कि जिंदगी में कुछ अलग करना है तो पहाड़ चढ़। मुझे समझ नहीं आया कि मैं उनकी इस बात का जवाब क्या दूं। लेकिन उनकी ये बात मेरे दिमाग पर इतना असर कर गई कि मैंने उसी रात भाई का फोन चुराया और इंटरनेट पर माउंटेंनिंग के बारे में सर्च करना शुरू कर दिया। यहीं से शुरू हुआ मेरी कामयाबी का सफर।'
किसे मानती हैं प्रेरणा?
इतनी कम उम्र में बड़े-बड़े पर्वतों को झुकाने वाली शिवांगी, दिव्यांग पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा को अपना प्रेरणास्रोत मानती हैं। हालांकि ममता सोधा को पुलिस उपाधीक्षक नियुक्त किए जाने की खबर ने उन्हें काफी प्रभावित किया। शिवांगी ने भारत की पहली विकलांग महिला के एवरेस्ट फतह के कुछ वीडियो देखे, जिससे प्रेरणा लेकर उन्होंने नवंबर 2016 में एवरेस्ट की चढ़ाई करने का फैसला किया।
कैसी मिली माउंटेन चढ़ने की ट्रेनिंग ?
शिवांगी ने बताया कि माउंटेनिंग के बारे में उन्हें गूगल से काफी मदद मिली, लेकिन गूगल से मिले ज्ञान की बुनियाद पर आप ऊंचे पर्वतों से नहीं टकरा सकते। इसके लिए प्रोफेशनल ट्रेनिंग और कोचिंग की जरूरत होती है। शिवांगी ने खुद 'जवाहर इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटेन' (जम्मू कश्मीर) और 'हिमालयन इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटेनीयरिंग इन दार्जिलिंग' से प्रशिक्षण लिया है। इसके अलावा भी वह कई अलग-अलग संस्थानों से इसका कोर्स कर चुकी हैं। शिवांगी ने बताया कि एक पर्वतारोही बनने के लिए उन्होंने अपने बाल भी छोटे-छोटे करवा लिए थे।
शिवांगी रोजाना 6 से 7 घंटे प्रशिक्षण लेती थीं। इसलिए वह स्कूल तक नहीं जा पाती थीं और अपना पूरा वक्त एवरेस्ट की चढ़ाई की तैयारी में ही गुजारती थीं। वह रोजाना करीब 10 किलोमीटर दौड़ती थीं। पहले शिवांगी का वजन 65 किलोग्राम था, जो दो साल बाद चोटी की चढ़ाई करते समय घटकर महज 48 किलोग्राम ही रह गया। शिवांगी ने बताया, 'पर्वतारोहण की जरूरतों के अनुसार मैंने अपने आपको ढाला।'
पर्वतारोही बनने में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ा ?
ट्रेनिंग पूरी होने के बाद शिवांगी के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए सिलेक्ट होना। कई जगह से निराश होने के बाद नेपाल की एक एजेंसी ने उन्हें यह मौका दिया। इस दौरान उनके परिवार को पैसों की तंगी से भी जूझना पड़ा। दरअसल माउंटेनिंग में प्रशिक्षण से लेकर एवरेस्ट का सफर तय करने तक बहुत ज्याद पैसों की जरूरत थी। रुपयों का इंतजाम इतनी जल्दी कर पाना परिवार के लिए मुश्किल था, इसलिए शिवांगी के पिता को अपना घर तक गिरवी रखना पड़ा।
इसके अलावा पर्वतों पर ऑक्सीजन की कमी ने भी कई बार उनके मंसूबों पर पानी फेरना चाहा, लेकिन शिवांगी ने हार नहीं मानी। शिवांगी ने बताया कि करीब 5 किलो के सिलेंडर के साथ भारी भरकम कपड़े पहनकर इंतनी ऊंचाई पर चढ़ना काफी मुश्किल था। 48 किलो की शिवांगी अपने वजन से करीब 15 किलोग्राम ज्यादा बोझ लेकर एवरेस्ट चढ़ी थीं।