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संस्कृत और वेदों के ज्ञाता शास्त्री दीपक ने जीत ली आखिरी लड़ाई, हासिल किया ओलंपिक कोटा

Wed, 06 Nov 2019 10:36 AM IST
Rajeev Rai स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Published by: Rajeev Rai Updated Wed, 06 Nov 2019 10:36 AM IST
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Sanskrit Shastri Deepak kumar wins olympic quota in shooting
दीपक कुमार - फोटो : social Media

'किस्मत से लडने में मजा आ रहा है दोस्तों, ये मुझे जीने नहीं दे रही और हार मैं मान नहीं रहा’। ये लाइनें शूटर दीपक कुमार ने अपने वाट्स एप डिसप्ले पिक्चर पर लगा रखी हैं। हकीकत भी यही है। बीते एक साल से वायुसेना में सार्जेंट 31 साल के दीपक के हाथ से टोकियो ओलंपिक का कोटा फिसल जा रहा था। पहले वल्र्ड चैंपियनशिप का फाइनल फिर उन्होंने ओलंपिक क्वालिफाइंग दो विश्व कप के फाइनल में प्रवेश किया, लेकिन मुहाने पर पहुंचकर भी टोक्यो का टिकट उनसे दूर रहा। आखिर मंगलवार को दोहा में दीपक का संघर्ष रंग लाया और उन्होंने एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक के साथ 10 मीटर एयर राइफल में देश को ओलंपिक कोटा दिला दिया।

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जकार्ता एशियाई खेलों में 10 मीटर एयरराइफल में रजत जीतने वाले दीपक लंबे समय से उतार-चढ़ाव देख रहे हैं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानने का फैसला कर रखा था। क्वालिफाइंग में वह 626.8 के स्कोर के साथ तीसरे स्थान पर रहे। फाइनल में उन्होंने 227.8 का स्कोर किया और दोनों चीनी शूटरों के बाद तीसरे स्थान पर रहे। यह पदक उन्हें ओलंपिक कोटा दिलाने के लिए काफी था

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गुरुकुल में संस्कृत में शास्त्री के साथ बने शूटर

Sanskrit Shastri Deepak kumar wins olympic quota in shooting
deepak kumar

दीपक संस्कृत और वेदों के ज्ञाता हैं। वह गुरुकुल के छात्र हैं और उन्होंने शास्त्री की उपाधि भी हासिल की है। उनके गुरुकुल जाने की कहानी भी दिलचस्प है। दीपक के अनुसार वह गुर्जर जाति से संबंधित हैं और दिल्ली के वजीराबाद के जगतपुर गांव के रहने वाले हैं। बचपन में दूसरे बच्चों की तरह वह भी बहुत शैतानी करते थे। उनके पिता को लगा कि गांव में रहकर दीपक बिगड़ जाएगा। तब उन्होंने उनको दिल्ली के गौतमनगर स्थित गुरुकुल में भेजने का फैसला किया। वह लगातार गुरुकुल में रहे जहां उन्होंने अच्छा इंसान बनने का सफर किया।

दीपक के मुताबिक संस्कृत ने उन्हें यही सिखाया और भी वह इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते हैं। वह अपने पुराने साथियों और वर्तमान शूटरों की हर संभव मदद करने की कोशिश करते हैं। उनसे कोई प्रतिस्पर्धा नहीं मानते हैं। दीपक खुलासा करते हैं कि वह अक्सर देहरादून के गुरुकुल जाते हैं। जहां वह आचार्य धनंजय के संरक्षण में रहते हैं। उनकी कोशिश यही रहती है कि किसी भी चैंपियनशिप में जाने से पहले थोड़े दिन के लिए गुरुकुल जरूर होकर आएं। 

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