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Hindi News ›   Sports ›   National Sports Day: Why India Celebrates August 29, Major Dhyan Chand’s Legacy and the Start of Khelo India

National Sports Day: हिटलर भी हुए थे जिनके खेल के मुरीद, उनकी जयंती पर क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय खेल दिवस?

Sat, 29 Aug 2026 08:35 AM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: स्वप्निल शशांक Updated Sat, 29 Aug 2026 08:35 AM IST
सार

भारत में हर साल 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। यह दिन महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की जयंती को समर्पित है। भारतीय हॉकी को विश्व मंच पर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले ध्यानचंद की उपलब्धियां आज भी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा हैं। इसी दिन 2018 में खेलो इंडिया अभियान की शुरुआत भी हुई थी।

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National Sports Day: Why India Celebrates August 29, Major Dhyan Chand’s Legacy and the Start of Khelo India
राष्ट्रीय खेल दिवस 2026 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत में 29 अगस्त का दिन खेल और खिलाड़ियों के सम्मान के लिए बेहद खास माना जाता है। इसी दिन वर्ष 1905 में महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद का जन्म हुआ था। हॉकी के मैदान पर उनकी अद्भुत कला और गोल करने की क्षमता ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। यही वजह है कि उनकी जयंती को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।भारत में पहली बार राष्ट्रीय खेल दिवस को 2012 में आधिकारिक रूप से उत्सव के दिनों की सूची में शामिल किया गया था।

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इसके बाद हर साल 29 अगस्त को देशभर में खेलों और शारीरिक फिटनेस को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दिन स्कूलों, कॉलेजों, खेल संस्थानों और विभिन्न सरकारी संस्थाओं में खेल प्रतियोगिताएं, फिटनेस गतिविधियां, सेमिनार और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। राष्ट्रीय खेल दिवस का मकसद सिर्फ मेजर ध्यानचंद को याद करना नहीं, बल्कि देश में खेल संस्कृति को बढ़ावा देना भी है।

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मेजर ध्यानचंद कौन थे, जिन्हें कहा जाता है 'हॉकी का जादूगर'?
मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद, वर्तमान प्रयागराज में हुआ था। उनके पिता सेना में थे और हॉकी खेलते थे। महज 16 वर्ष की उम्र में ध्यानचंद भी सेना में शामिल हो गए। सेना में रहते हुए हॉकी के प्रति उनका जुनून लगातार बढ़ता गया। ध्यानचंद ने करीब 22 वर्षों तक भारत का प्रतिनिधित्व किया और अंतरराष्ट्रीय हॉकी में 400 से अधिक गोल करने का गौरव हासिल किया।

उनके खेल की सबसे बड़ी खासियत गेंद पर उनका जबरदस्त नियंत्रण था। उनके बारे में मशहूर था कि गेंद उनकी हॉकी स्टिक से इस तरह चिपकी रहती थी, जैसे स्टिक और गेंद के बीच कोई अदृश्य रिश्ता हो। यही कारण था कि उन्हें दुनिया भर में 'हॉकी का जादूगर' कहा जाने लगा।

तीन ओलंपिक, तीन स्वर्ण और भारतीय हॉकी का सुनहरा दौर
मेजर ध्यानचंद भारतीय हॉकी के उस दौर के सबसे बड़े सितारे थे, जब दुनिया में भारतीय हॉकी का दबदबा था। उन्होंने लगातार तीन ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

ध्यानचंद के तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक:
 

  • 1928 एम्सटर्डम ओलंपिक: स्वर्ण पदक
  • 1932 लॉस एंजेलिस ओलंपिक: स्वर्ण पदक
  • 1936 बर्लिन ओलंपिक: स्वर्ण पदक


इन तीनों ओलंपिक में उनके प्रदर्शन ने भारतीय हॉकी को विश्व स्तर पर अलग पहचान दिलाई। खास तौर पर 1936 का बर्लिन ओलंपिक उनके करियर की सबसे यादगार घटनाओं में से एक माना जाता है।

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मेजर ध्यानचंद - फोटो : Twitter

जब जर्मनी को 8-1 से हराकर भारत ने जीता था स्वर्ण
1936 के बर्लिन ओलंपिक के फाइनल में भारत का सामना मेजबान जर्मनी से हुआ था। यह मुकाबला सिर्फ एक खेल नहीं था, बल्कि उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भी बेहद महत्वपूर्ण माना गया। ध्यानचंद की अगुआई वाली भारतीय टीम ने जर्मनी को 8-1 से करारी शिकस्त दी और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस मुकाबले में ध्यानचंद के खेल से जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर के प्रभावित होने की कहानी भी खूब चर्चित रही है। कई किस्सों के मुताबिक हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मन सेना में बड़े पद की पेशकश की थी।

हालांकि, ध्यानचंद से जुड़ी हिटलर वाली कहानी के कई लोकप्रिय संस्करण मिलते हैं और उनके हर विवरण की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि नहीं होती। लेकिन यह निर्विवाद है कि बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद का प्रदर्शन भारतीय खेल इतिहास के सबसे यादगार अध्यायों में शामिल है।

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तिरंगा नहीं लहरा पाने का ध्यानचंद को था मलाल
1936 में भारत ने स्वर्ण पदक तो जीत लिया था, लेकिन उस समय देश ब्रिटिश शासन के अधीन था। इसलिए भारतीय टीम की जीत के मौके पर तिरंगा नहीं लहराया गया था। ध्यानचंद से जुड़ा एक बेहद भावुक किस्सा इसी घटना से संबंधित है। कहा जाता है कि स्वर्ण जीतने के बाद वह बेहद भावुक हो गए थे और उन्हें इस बात का दुख था कि भारत की जीत के साथ तिरंगा नहीं लहराया गया। उनके लिए पदक और व्यक्तिगत उपलब्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण उनका देश था। यही भावना उन्हें सिर्फ महान खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनाती है।

क्या सच में ध्यानचंद की स्टिक से चिपक जाती थी गेंद?
मेजर ध्यानचंद की हॉकी कला को लेकर कई दिलचस्प किस्से आज भी सुनाए जाते हैं। सबसे लोकप्रिय कहानी उनकी हॉकी स्टिक से जुड़ी है। कहा जाता है कि विपक्षी खिलाड़ियों को विश्वास ही नहीं होता था कि गेंद पर ध्यानचंद का इतना शानदार नियंत्रण प्राकृतिक हो सकता है। एक मुकाबले के दौरान उनकी स्टिक की जांच तक किए जाने का किस्सा प्रसिद्ध है।

जापान में भी उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की अफवाह का जिक्र मिलता है। हालांकि, इन कहानियों का ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन ये किस्से इस बात को जरूर दर्शाते हैं कि ध्यानचंद की ड्रिब्लिंग और गेंद पर पकड़ विपक्षी टीमों के लिए कितनी अविश्वसनीय हुआ करती थी।

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मेजर ध्यानचंद - फोटो : Twitter
जब ध्यानचंद ने गोल पोस्ट की लंबाई पर उठाया सवाल
ध्यानचंद के खेल से जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा उनकी ईमानदारी और खेल के नियमों के प्रति सम्मान को दिखाता है। बताया जाता है कि एक मुकाबले में उन्होंने कई प्रयास किए, लेकिन गेंद गोल पोस्ट में नहीं जा रही थी। यह उनके लिए असामान्य स्थिति थी। उन्होंने आखिरकार रेफरी के सामने गोल पोस्ट को लेकर सवाल उठाया।

जब गोल पोस्ट की लंबाई की जांच की गई तो वह निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं थी। यानी ध्यानचंद ने अपने पक्ष में फायदा उठाने के बजाय नियमों के मुताबिक खेल होने पर जोर दिया। यही खेल भावना उनकी महानता का एक और उदाहरण मानी जाती है।

2018 में इसी दिन शुरू हुआ था खेलो इंडिया अभियान
राष्ट्रीय खेल दिवस का महत्व सिर्फ मेजर ध्यानचंद की जयंती तक सीमित नहीं है। 29 अगस्त 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खेलो इंडिया अभियान की शुरुआत की थी। इस अभियान का उद्देश्य देश में जमीनी स्तर पर खेल प्रतिभाओं को पहचानना, युवाओं को खेलों से जोड़ना और भारत में खेल संस्कृति को मजबूत करना था।

खेलो इंडिया के जरिए अलग-अलग खेलों में उभरती प्रतिभाओं को प्रशिक्षण, प्रतियोगिताओं और बेहतर खेल अवसरों से जोड़ने की दिशा में काम किया गया। इस लिहाज से 29 अगस्त भारतीय खेल इतिहास के दो महत्वपूर्ण पहलुओं को जोड़ता है, एक तरफ ध्यानचंद की महान विरासत और दूसरी तरफ नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को तैयार करने का प्रयास।

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मेजर ध्यानचंद - फोटो : Twitter
राष्ट्रीय खेल दिवस पर खिलाड़ियों को मिलता है सम्मान
राष्ट्रीय खेल दिवस का एक प्रमुख उद्देश्य देश के बेहतरीन खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को सम्मानित करना भी है। इसी अवसर पर खेल के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले खिलाड़ियों को विभिन्न राष्ट्रीय खेल पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। इस दिन अर्जुन पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार और खेल क्षेत्र से जुड़े अन्य सम्मानों के जरिए खिलाड़ियों और कोचों के योगदान को पहचान दी जाती है। यह दिन युवाओं को यह संदेश भी देता है कि खेल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि अनुशासन, फिटनेस, टीमवर्क और देश का प्रतिनिधित्व करने का जरिया भी है।

मेजर ध्यानचंद की विरासत आज भी क्यों महत्वपूर्ण है?
आज क्रिकेट, बैडमिंटन, एथलेटिक्स, शूटिंग, कुश्ती और दूसरे खेलों में भारत के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। लेकिन भारतीय खेलों की इस यात्रा में हॉकी और मेजर ध्यानचंद का योगदान बेहद खास है। ध्यानचंद ने ऐसे दौर में भारत को विश्व मंच पर पहचान दिलाई, जब खेलों में सुविधाएं और आधुनिक प्रशिक्षण आज की तरह उपलब्ध नहीं थे।

उनकी कहानी सिर्फ गोल और पदकों की कहानी नहीं है। यह अनुशासन, देशप्रेम, खेल भावना और असाधारण प्रतिभा की कहानी है। इसीलिए 29 अगस्त को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय खेल दिवस आज भी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारत की खेल विरासत और भविष्य की खेल महत्वाकांक्षाओं के बीच एक मजबूत कड़ी है।
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