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कौन हैं दिलीप गावित?: पैरा एशियन गेम्स में जीता स्वर्ण पदक, बचपन में हादसे ने छीन लिया था हाथ; पढ़ें कहानी
Wed, 21 Oct 2026 04:00 PM IST
शोभित चतुर्वेदी
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नागोया
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नागोया
Published by: शोभित चतुर्वेदी
Updated Wed, 21 Oct 2026 04:00 PM IST
सार
पैरा एशियन गेम्स में दिलीप गावित ने शानदार प्रदर्शन किया और स्वर्ण पदक जीता। पुरुषों की 100 मीटर टी47 स्पर्धा में दिलीप के अलावा मोहम्मद मोर्सिंगनाकथ ने रजत अपने नाम किया।
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दिलीप गावित
- फोटो : SAI Media
विस्तार
भारत के दिलीप गावित ने पैरा एशियन गेम्स में पुरुषों की 100 मीटर टी47 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता, जबकि भारत के ही मोहम्मद मोर्सिंगनाकथ को रजत पदक मिला। गावित ने 10.69 सेकेंड का समय निकालकर स्वर्ण हासिल किया। वहीं, मोर्सिंगनाकथ ने 10.72 सेकेंड का समय निकाला। चीन के कांगजुन शि ने 10.80 सेकेंड के समय के साथ कांस्य पदक जीता।
टी47 उन खिलाड़ियों के लिए है जिनके शरीर के ऊपरी हिस्से के एक तरफ कोई कमी होती है जिसके कारण संतुलन और तालमेल में कम से मध्यम स्तर की असंतुलित चुनौतियां आती हैं। महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास स्थित छोटे से गांव तोरण डोंगरी में जन्मे दिलीप एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। बचपन खेतों में माता-पिता का हाथ बंटाते हुए बीता। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यही लड़का एक दिन देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचेगा
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टी47 उन खिलाड़ियों के लिए है जिनके शरीर के ऊपरी हिस्से के एक तरफ कोई कमी होती है जिसके कारण संतुलन और तालमेल में कम से मध्यम स्तर की असंतुलित चुनौतियां आती हैं। महाराष्ट्र के नासिक जिले के पास स्थित छोटे से गांव तोरण डोंगरी में जन्मे दिलीप एक साधारण किसान परिवार से आते हैं। बचपन खेतों में माता-पिता का हाथ बंटाते हुए बीता। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यही लड़का एक दिन देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचेगा
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एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी
दिलीप की उम्र तब महज पांच-छह साल थी। गांव में खेलते समय वह एक पेड़ से गिर पड़े। गिरने से उनके दाहिने हाथ में गंभीर चोट लगी। गांव में बेहतर चिकित्सा सुविधा नहीं थी और समय पर इलाज भी नहीं मिल पाया। धीरे-धीरे घाव में गैंग्रीन फैल गया और डॉक्टरों को कोहनी के नीचे से उनका हाथ काटना पड़ा। इतनी छोटी उम्र में हाथ खो देना किसी भी बच्चे के लिए जिंदगी भर का दर्द बन सकता था, लेकिन दिलीप ने अपनी कमजोरी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
दिलीप की उम्र तब महज पांच-छह साल थी। गांव में खेलते समय वह एक पेड़ से गिर पड़े। गिरने से उनके दाहिने हाथ में गंभीर चोट लगी। गांव में बेहतर चिकित्सा सुविधा नहीं थी और समय पर इलाज भी नहीं मिल पाया। धीरे-धीरे घाव में गैंग्रीन फैल गया और डॉक्टरों को कोहनी के नीचे से उनका हाथ काटना पड़ा। इतनी छोटी उम्र में हाथ खो देना किसी भी बच्चे के लिए जिंदगी भर का दर्द बन सकता था, लेकिन दिलीप ने अपनी कमजोरी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
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दिलीप गावित
- फोटो : IANS/Twitter
गांव की कच्ची सड़कें बनीं पहली दौड़ की ट्रैक
हाथ खोने के बाद भी दिलीप का आत्मविश्वास नहीं टूटा। उन्होंने दौड़ना शुरू किया। गांव की कच्ची सड़कों पर बिना किसी आधुनिक सुविधा के रोज अभ्यास करते रहे। उनके भीतर की प्रतिभा को सबसे पहले एथलेटिक्स कोच वैजनाथ काले ने पहचाना। काले ने सिर्फ उनकी प्रतिभा ही नहीं देखी, बल्कि उनके परिवार को भी समझाया कि बेटे को खेल में आगे बढ़ने का मौका दिया जाए। शुरुआती दिनों में उन्होंने दिलीप के प्रशिक्षण, रहने और अन्य खर्चों की जिम्मेदारी भी उठाई।
हाथ खोने के बाद भी दिलीप का आत्मविश्वास नहीं टूटा। उन्होंने दौड़ना शुरू किया। गांव की कच्ची सड़कों पर बिना किसी आधुनिक सुविधा के रोज अभ्यास करते रहे। उनके भीतर की प्रतिभा को सबसे पहले एथलेटिक्स कोच वैजनाथ काले ने पहचाना। काले ने सिर्फ उनकी प्रतिभा ही नहीं देखी, बल्कि उनके परिवार को भी समझाया कि बेटे को खेल में आगे बढ़ने का मौका दिया जाए। शुरुआती दिनों में उन्होंने दिलीप के प्रशिक्षण, रहने और अन्य खर्चों की जिम्मेदारी भी उठाई।
दिव्यांग नहीं, सामान्य खिलाड़ियों से मुकाबला करना चाहते थे
दिलीप की सबसे बड़ी खासियत उनकी सोच थी। शुरुआत में वह पैरा प्रतियोगिताओं में हिस्सा ही नहीं लेना चाहते थे। उनका मानना था कि अगर खुद को साबित करना है तो पहले सामान्य खिलाड़ियों के बीच मुकाबला करना चाहिए। उन्होंने अंडर-18 राष्ट्रीय प्रतियोगिता के 200 मीटर फाइनल तक जगह बनाई। खेलो इंडिया यूथ गेम्स में महाराष्ट्र की 4×100 मीटर रिले टीम के साथ पदक भी जीता। एक हाथ से बैटन बदलना आसान नहीं होता, लेकिन दिलीप ने यह चुनौती भी पार कर दिखाई। बाद में कोच की सलाह पर उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में कदम रखा और यहीं से उनकी असली उड़ान शुरू हुई।
दिलीप की सबसे बड़ी खासियत उनकी सोच थी। शुरुआत में वह पैरा प्रतियोगिताओं में हिस्सा ही नहीं लेना चाहते थे। उनका मानना था कि अगर खुद को साबित करना है तो पहले सामान्य खिलाड़ियों के बीच मुकाबला करना चाहिए। उन्होंने अंडर-18 राष्ट्रीय प्रतियोगिता के 200 मीटर फाइनल तक जगह बनाई। खेलो इंडिया यूथ गेम्स में महाराष्ट्र की 4×100 मीटर रिले टीम के साथ पदक भी जीता। एक हाथ से बैटन बदलना आसान नहीं होता, लेकिन दिलीप ने यह चुनौती भी पार कर दिखाई। बाद में कोच की सलाह पर उन्होंने पैरा एथलेटिक्स में कदम रखा और यहीं से उनकी असली उड़ान शुरू हुई।