हॉकी के जादूगर का जन्मदिन, 10 अनसुनी कहानियां
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हमारे दद्दा यानी हॉकी के जादूगर ध्यानचंद। हर भारतीय को उन पर नाज है। आजादी से पहले भारत ने लगातार 3 ओलंपिक में हॉकी में स्वर्ण पदक जीता। उसमें दद्दा की हॉकी कलाकारी का किरदार सबसे अहम रहा। अपनी इसी कलाकारी से ध्यानचंद ने जर्मनी के एडोल्फ हिटलर जैसे जिद्दी शासक तक को अपना मुरीद बना लिया था।
1. ध्यानचंद को 'चंद' की संज्ञा देने के पीछे एक कहानी है। दरअसल, ड्यूटी पूरी करने के बाद वह रात को मैदान में हॉकी की प्रैक्टिस किया करते थे। उस वक्त स्ट्रीट लाइट की कोई व्यवस्था न होने के चलते वह अंधेरे में ही प्रैक्टिस किया करते थे। बावजूद इसके वह गेंद को आसानी से हिट कर देते थे। चंद को हिंदी में चंद्रमा कहा जाता है। उनकी इसी महारथ पर उनके दोस्तों ने उन्हें 'चंद' कहना शुरू किया, इसके बाद यह उपमा उनके नाम के साथ भी जुड़ गया।
2. 1928 के ओलंपिक में ध्यानचंद एमस्टरडेम ओलंपिक में सर्वश्रेष्ठ गोल करने वाले खिलाड़ी बने थे। उन्होंने कुल 14 गोल दागे। भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद अंग्रेजी मीडिया ने इसका श्रेय ध्यानचंद को कुछ इस तरह दिया था, "यह हॉकी का खेल नहीं बल्कि जादू था, जिसे ध्यानचंद ने मुमकिन कर दिखाया।"
3. हॉकी के जादूगर ध्यानचंद से जब तत्कालीन मीडिया ने हॉकी में उनके सबसे खास और यादगार मैच के बारे में पूछा था तो उन्होंने बड़े ही सरलता से जवाब दिया, कि "मेरे लिए सभी मैच खास थे, लेकिन 1933 में बेटन कप में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया फाइनल मुकाबला सबसे रोचक रहा था।"
4. सिर्फ ध्यान चंद ही नहीं उनके भाई रुप सिंह भी हॉकी के बड़े खिलाड़ी थे। 1932 में ग्रीष्मकालीन ओलंपिक हॉकी फाइनल मुकाबले में भारत ने यूएसए को रिकॉर्ड 24-1 से कड़ी शिकस्त दी थी। इसमें ध्यानचंद ने 8 गोल दागे थे जबकि रुप सिंह ने 10 गोल किए।
5. बात 1936 में बर्लिन ओलंपिक की है। भारत पहले मैच के बाद शानदार फॉर्म में था। लोग उस वक्त हॉकी की बजाय अन्य खेलों जैसे क्रिकेट और फुटबॉल में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे थे। उस वक्त एक जर्मन अखबार ने बैनर हेडलाइन दी, "ओलंपिक में जादूगरी शो।" उस वक्त भारत के हर मैच से बर्लिन में पोस्टर लगे थे, "हॉकी स्टेडियम जाइए और भारतीय जादूगर ध्यानचंद की जादूगरी देखिए।"
दुनिया में हॉकी में ध्यानचंद को वही मुकाम हासिल है, जो क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन को और फुटबॉल में पेले को है। आज अपने दद्दा यानी हॉकी के 'जादूगर' मेजर ध्यानचंद का 110वां जन्मदिन है। 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में राजपूत परिवार में जन्में ध्यानचंद मात्र 16 साल की उम्र में ही ब्रिटिश आर्मी में भर्ती हो गए थे। उन्हें हॉकी से पहले ही लगाव था।
1948 में अपना अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले ध्यानचंद ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 400 से भी ज्यादा गोल दागे हैं। उनके जन्मदिन पर पेश है इस महान खिलाड़ी के करियर से जुड़ी 10 बेहद खास बातें।
तानाशाह हिटलर ने दिया था ध्यानचंद को अनोखा संदेश
अभी तक आपने ध्यानचंद से जुड़ी 5 खास बातें पढ़ी। शेष 5 बातें आपके लिए इस पेज पर।
6. बर्लिन ओलंपिक में शानदार खेल से लोगों का दिल जीतने वाले ध्यानचंद के शार्गिदों में एक नाम जर्मनी के तानाशाह हिटलर का भी था। हिटलर भी उनके खेल का दीवाना हो गया था। तब हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी की नागरिकता लेने का ऑफर भी किया और जर्मनी की सेना में शामिल होने का न्यौता भी दिया। लेकिन उसे भारत ने नकार दिया।
7. पूरी दुनिया में अपने नाम का डंका बजाने वाले मेजर ध्यानचंद के एक फैन क्रिकेट के पितामह और ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज सर डॉन ब्रेडमैन भी थे। 1935 में एडिलेड में दोनों की मुलाकात हुई। ध्यानचंद के खेल कौशल को देखकर ब्रेडमैन ने कहा था कि, "यह खिलाड़ी हॉकी में ऐसे गोल करता है जैसे क्रिकेट में रन"।
8. सिर्फ भारत ही नहीं विदेशों में भी ध्यानचंद की मूर्ति स्थापित है। विएना स्थित एक स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक स्टेच्यू है। यहां भी उन्होंने अपना खेल दिखाकर दर्शकों का दिल जीत लिया था।
9. एक मैच के दौरान जब ध्यानचंद गोल करने में कामयाब नहीं हो पा रहे थे तो उन्होंने मैच रेफरी से गोल पोस्ट की चौड़ाई नापने की विनती की। जब गोलपोस्ट की चौड़ाई नापी गई तो सभी अचंभित हो गए। गोलपोस्ट नियमानुसार चौड़ाई से काफी छोटा था।
10. नीदरलैंड में एक टूर्नामेंट के दौरान ध्यानचंद की हॉकी स्टिक चर्चाओं में आई। वहां के विभागीय अधिकारियों को शक हुआ कि उनकी हॉकी स्टिक में मैगनेट (चुंबकीय शक्ति) है। लिहाजा उनकी हॉकी स्टिक तोड़ दी गई लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा क्योंकि जादू हॉकी स्टिक में नहीं ध्यानचंद के हाथों में था।