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हॉकी विश्वकप 2026: भारतीय पुरुष टीम के खराब प्रदर्शन के बाद दिग्गजों ने उठाए सवाल; श्रीजेश-जगबीर ने क्या कहा?
Tue, 25 Aug 2026 03:21 PM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Tue, 25 Aug 2026 03:21 PM IST
सार
51 साल बाद विश्व कप में पदक जीतने का सपना लेकर उतरी भारतीय पुरुष हॉकी टीम सेमीफाइनल में भी जगह नहीं बना सकी। अर्जेंटीना से 3-5 की हार के बाद पूर्व दिग्गज खिलाड़ियों ने टीम चयन, युवा खिलाड़ियों को पर्याप्त मौके नहीं देने और एक ही कोर ग्रुप पर निर्भर रहने पर सवाल उठाए। उन्होंने डिफेंस, निरंतरता और घरेलू ढांचे की कमियों को भी चिंता का विषय बताया।
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भारतीय पुरुष हॉकी टीम
- फोटो : @DilipTirkey
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विस्तार
भारतीय पुरुष हॉकी टीम का विश्व कप में 51 साल बाद पदक जीतने का इंतजार इस बार भी खत्म नहीं हो सका। अर्जेंटीना के खिलाफ 3-5 की हार के साथ टीम की सेमीफाइनल में पहुंचने की उम्मीदें भी समाप्त हो गईं। इस हार ने पेरिस ओलंपिक के बाद से टीम के प्रदर्शन में नजर आ रही कमजोरियों को एक बार फिर सामने ला दिया है।
पूर्व दिग्गज खिलाड़ियों का मानना है कि समस्या सिर्फ धीमी शुरुआत, मौकों को गंवाने या डिफेंस में चूक तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि युवा खिलाड़ियों को समय रहते मौके नहीं देना और एक ही कोर ग्रुप पर लगातार निर्भर रहना भी टीम के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है।
युवा खिलाड़ियों को मौका नहीं देने पर सवाल
पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद संन्यास लेने वाले पूर्व गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने टीम में युवा खिलाड़ियों को समय पर शामिल नहीं किए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि लॉस एंजिलिस ओलंपिक में अब ज्यादा समय नहीं बचा है और इतने कम अंतरराष्ट्रीय मैचों में नए खिलाड़ियों को तैयार करना मुश्किल होगा।
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श्रीजेश ने कहा, 'सीनियर खिलाड़ियों के जाने के बाद उनकी जगह कौन लेगा। क्या हमने दूसरी जमात तैयार की है। लॉस एंजिलिस ओलंपिक में दो ही साल बचे हैं और उससे पहले करीब तीस अंतरराष्ट्रीय मैच ही होंगे। क्या ओलंपिक के लिये इससे खिलाड़ी तैयार हो सकते हैं। नहीं।' उन्होंने कहा, 'विश्व कप की टीम में भी वही कोर खिलाड़ी हैं जबकि मनमीत सिंह, आमिर अली, रोशन कुजूर, तालेम प्रियब्रत, रोहित, अर्शदीप जैसे कई प्रतिभाशाली जूनियर इंतजार ही कर रहे हैं।'
चयन के फैसलों पर भी उठे सवाल
पूर्व ओलंपियन जगबीर सिंह ने भी चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। उनका मानना है कि जूनियर खिलाड़ियों को सही समय पर अवसर दिए जाने चाहिए थे और कुछ चयन फैसलों को बेहतर किया जा सकता था। जगबीर सिंह ने कहा, 'जूनियर खिलाड़ियों को सही समय पर मौके मिलने चाहिये और चयन के कुछ फैसले बेहतर हो सकते थे। तैयारी ओलंपिक से ओलंपिक की होनी चाहिये। कोचिंग स्टाफ ने अनुभव को ही तरजीह दी जो काम नहीं आया। भारत के पास यह सर्वश्रेष्ठ मौका था लेकिन प्रदर्शन में निरंतरता नहीं दिखी। हर दस मिनट में डिफेंस चरमरा रहा था।'
भास्करन ने फॉरवर्ड और मिडफील्ड पर उठाए सवाल
ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता और पूर्व कप्तान वासुदेवन भास्करन ने भारतीय टीम के आक्रमण और मिडफील्ड के प्रदर्शन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में भारतीय फॉरवर्ड लाइन का प्रदर्शन उन्हें प्रभावित नहीं कर सका। भास्करन ने कहा, 'मैंने पिछले चार साल में किसी भारतीय फॉरवर्ड को अच्छा खेलते नहीं देखा। बैक पास कहां थे, गोल पर कितने हमले किये और फुल प्रेस जाने के समय मिडफील्ड पूरा खाली छोड़ दिया।'
उन्होंने टीम में नए खिलाड़ियों को मौके नहीं देने पर भी सवाल उठाया। भास्करन ने कहा, 'हमने नये खिलाड़ियों को मौके ही नहीं दिये। नीदरलैंड की पेरिस ओलंपिक टीम के छह स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी विश्व कप टीम में नहीं थे। हम हमदर्दी, पिछले रिकॉर्ड और आंकड़ों पर ही टीम चुन लेते हैं। कम से कम छह जूनियर खिलाड़ियों को प्रो लीग में आजमाना चाहिये था।' उन्होंने जूनियर विश्व कप कांस्य पदक विजेता कोच श्रीजेश से सलाह नहीं लिए जाने पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि दूसरे देशों में जूनियर कोचों की भूमिका अहम होती है और वे सीनियर कोचों को भी अपनी राय देते हैं।
परगट सिंह ने घरेलू ढांचे को बताया कमजोर
पूर्व ओलंपियन परगट सिंह ने भारतीय हॉकी के घरेलू ढांचे को लेकर चिंता जताई। उनका मानना है कि अच्छी घरेलू प्रतियोगिताओं की कमी के कारण टीम के पास मजबूत बेंच स्ट्रेंथ तैयार नहीं हो पा रही है। परगट सिंह ने कहा, 'अच्छी घरेलू स्पर्धायें नहीं होने से हमारे पास अच्छी बेंच स्ट्रेंथ नहीं है। यूरोप में कई डिविजन की लीग होती है जो हमारे यहां नहीं है। पहले बेटन कप, आगा खान कप, बांबे गोल्ड कप, मुरूगप्पा कप, नेहरू हॉकी से अच्छी प्रतिभायें निकलती थी। सारा ढांचा ही खराब कर दिया है। इसके अलावा नये खिलाड़ियों को मौका देना था तो दो साल पहले ही बदलाव की शुरूआत कर देनी चाहिये थी।'
एशिया में सफलता के बाद यूरोप में क्यों लड़खड़ाता है भारत?
एक अन्य ओलंपियन ने भी भारतीय हॉकी की तैयारियों और प्रदर्शन के तरीके पर सवाल उठाया। उनका मानना है कि एशियाई स्तर पर सफलता हासिल करने के बाद टीम बड़े टूर्नामेंटों में अपनी कमियों को नजरअंदाज कर देती है। उन्होंने कहा, 'एशियाई स्तर पर ही खुद का आकलन हो जाता है कि एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफी जीत ली और एशिया कप जीत लिया तो हो गया। यूरोपीय टीमों के सामने टायं टायं फिस्स। यही कहानी चली आ रही है। प्रो लीग में नौ टीमों में आठवें नंबर पर रहते हैं।'
विश्व कप से बाहर होने के बाद अब भारतीय हॉकी के सामने सिर्फ एक टूर्नामेंट का नतीजा सुधारने की चुनौती नहीं है। पूर्व खिलाड़ियों की बातों में टीम चयन, युवा खिलाड़ियों को तैयार करने, घरेलू ढांचे को मजबूत करने और बड़े टूर्नामेंटों के लिए बेहतर तैयारी की जरूरत साफ नजर आती है।
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पूर्व दिग्गज खिलाड़ियों का मानना है कि समस्या सिर्फ धीमी शुरुआत, मौकों को गंवाने या डिफेंस में चूक तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि युवा खिलाड़ियों को समय रहते मौके नहीं देना और एक ही कोर ग्रुप पर लगातार निर्भर रहना भी टीम के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है।
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युवा खिलाड़ियों को मौका नहीं देने पर सवाल
पेरिस ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद संन्यास लेने वाले पूर्व गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने टीम में युवा खिलाड़ियों को समय पर शामिल नहीं किए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि लॉस एंजिलिस ओलंपिक में अब ज्यादा समय नहीं बचा है और इतने कम अंतरराष्ट्रीय मैचों में नए खिलाड़ियों को तैयार करना मुश्किल होगा।
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श्रीजेश ने कहा, 'सीनियर खिलाड़ियों के जाने के बाद उनकी जगह कौन लेगा। क्या हमने दूसरी जमात तैयार की है। लॉस एंजिलिस ओलंपिक में दो ही साल बचे हैं और उससे पहले करीब तीस अंतरराष्ट्रीय मैच ही होंगे। क्या ओलंपिक के लिये इससे खिलाड़ी तैयार हो सकते हैं। नहीं।' उन्होंने कहा, 'विश्व कप की टीम में भी वही कोर खिलाड़ी हैं जबकि मनमीत सिंह, आमिर अली, रोशन कुजूर, तालेम प्रियब्रत, रोहित, अर्शदीप जैसे कई प्रतिभाशाली जूनियर इंतजार ही कर रहे हैं।'
चयन के फैसलों पर भी उठे सवाल
पूर्व ओलंपियन जगबीर सिंह ने भी चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। उनका मानना है कि जूनियर खिलाड़ियों को सही समय पर अवसर दिए जाने चाहिए थे और कुछ चयन फैसलों को बेहतर किया जा सकता था। जगबीर सिंह ने कहा, 'जूनियर खिलाड़ियों को सही समय पर मौके मिलने चाहिये और चयन के कुछ फैसले बेहतर हो सकते थे। तैयारी ओलंपिक से ओलंपिक की होनी चाहिये। कोचिंग स्टाफ ने अनुभव को ही तरजीह दी जो काम नहीं आया। भारत के पास यह सर्वश्रेष्ठ मौका था लेकिन प्रदर्शन में निरंतरता नहीं दिखी। हर दस मिनट में डिफेंस चरमरा रहा था।'
भास्करन ने फॉरवर्ड और मिडफील्ड पर उठाए सवाल
ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता और पूर्व कप्तान वासुदेवन भास्करन ने भारतीय टीम के आक्रमण और मिडफील्ड के प्रदर्शन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पिछले चार साल में भारतीय फॉरवर्ड लाइन का प्रदर्शन उन्हें प्रभावित नहीं कर सका। भास्करन ने कहा, 'मैंने पिछले चार साल में किसी भारतीय फॉरवर्ड को अच्छा खेलते नहीं देखा। बैक पास कहां थे, गोल पर कितने हमले किये और फुल प्रेस जाने के समय मिडफील्ड पूरा खाली छोड़ दिया।'
उन्होंने टीम में नए खिलाड़ियों को मौके नहीं देने पर भी सवाल उठाया। भास्करन ने कहा, 'हमने नये खिलाड़ियों को मौके ही नहीं दिये। नीदरलैंड की पेरिस ओलंपिक टीम के छह स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी विश्व कप टीम में नहीं थे। हम हमदर्दी, पिछले रिकॉर्ड और आंकड़ों पर ही टीम चुन लेते हैं। कम से कम छह जूनियर खिलाड़ियों को प्रो लीग में आजमाना चाहिये था।' उन्होंने जूनियर विश्व कप कांस्य पदक विजेता कोच श्रीजेश से सलाह नहीं लिए जाने पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि दूसरे देशों में जूनियर कोचों की भूमिका अहम होती है और वे सीनियर कोचों को भी अपनी राय देते हैं।
परगट सिंह ने घरेलू ढांचे को बताया कमजोर
पूर्व ओलंपियन परगट सिंह ने भारतीय हॉकी के घरेलू ढांचे को लेकर चिंता जताई। उनका मानना है कि अच्छी घरेलू प्रतियोगिताओं की कमी के कारण टीम के पास मजबूत बेंच स्ट्रेंथ तैयार नहीं हो पा रही है। परगट सिंह ने कहा, 'अच्छी घरेलू स्पर्धायें नहीं होने से हमारे पास अच्छी बेंच स्ट्रेंथ नहीं है। यूरोप में कई डिविजन की लीग होती है जो हमारे यहां नहीं है। पहले बेटन कप, आगा खान कप, बांबे गोल्ड कप, मुरूगप्पा कप, नेहरू हॉकी से अच्छी प्रतिभायें निकलती थी। सारा ढांचा ही खराब कर दिया है। इसके अलावा नये खिलाड़ियों को मौका देना था तो दो साल पहले ही बदलाव की शुरूआत कर देनी चाहिये थी।'
एशिया में सफलता के बाद यूरोप में क्यों लड़खड़ाता है भारत?
एक अन्य ओलंपियन ने भी भारतीय हॉकी की तैयारियों और प्रदर्शन के तरीके पर सवाल उठाया। उनका मानना है कि एशियाई स्तर पर सफलता हासिल करने के बाद टीम बड़े टूर्नामेंटों में अपनी कमियों को नजरअंदाज कर देती है। उन्होंने कहा, 'एशियाई स्तर पर ही खुद का आकलन हो जाता है कि एशियाई चैम्पियंस ट्रॉफी जीत ली और एशिया कप जीत लिया तो हो गया। यूरोपीय टीमों के सामने टायं टायं फिस्स। यही कहानी चली आ रही है। प्रो लीग में नौ टीमों में आठवें नंबर पर रहते हैं।'
विश्व कप से बाहर होने के बाद अब भारतीय हॉकी के सामने सिर्फ एक टूर्नामेंट का नतीजा सुधारने की चुनौती नहीं है। पूर्व खिलाड़ियों की बातों में टीम चयन, युवा खिलाड़ियों को तैयार करने, घरेलू ढांचे को मजबूत करने और बड़े टूर्नामेंटों के लिए बेहतर तैयारी की जरूरत साफ नजर आती है।