एक्सक्लूसिव: सुमित वाल्मीकि बोले- पुरुष हॉकी टीम ने भले ही पदक जीता, लेकिन महिला टीम ने देश का दिल जीत लिया
टोक्यो ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने 41 साल बाद पदक जीता। सोनीपत के सुमित वाल्मीकि भी इस टीम का हिस्सा रहे। पढ़ें, खेल दिवस के मौके पर उनसे खास बातचीत।
विस्तार
टोक्यो ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने जर्मनी को 5-4 से हराकर कांस्य पदक जीता। पहला ओलंपिक खेल रहे सुमित वाल्मीकि इस टीम में बतौर मिडफील्डर शामिल रहे। खेल दिवस के मौके पर उन्होंने अमर उजाला डॉट कॉम के साथ खास बातचीत की। इस दौरान सुमित ने कहा कि मेडल जीतकर जब स्वदेश लौटा तो जिस तरह से प्यार मिला, उसकी उम्मीद नहीं थी। देशवासियों ने हद से ज्यादा प्यार दिया है। बीते इतने वर्षों में कोई हॉकी को पूछता तक नहीं था, लेकिन पदक जीतने के बाद लोग हॉकी को इतना प्यार दे रहे हैं। इससे जोश बढ़ा है और आने वाले समय में हॉकी में पदक का रंग बदलकर लाना है। पढ़ें, बातचीत के प्रमुख अंश..
सवाल- 41 साल बाद भारतीय हॉकी टीम ने मेडल जीता, कैसा महसूस हुआ?
जवाब- बहुत ज्यादा एक्साइटमेंट थी। मैं हरियाणा से आता हूं तो लोग यही बोलते हैं कि लठ गाड़ दिया। जब भी कहीं निकलते थे कि तो यही सुनने को मिलता था कि हॉकी में काफी समय से मेडल नहीं आया, जबकि हर गेम्स में मेडल आता है। मैं यही सोचता था कि हमारी जो पुरानी हॉकी थी, पता नहीं कहां गुम हो गई है। जब मैं यह सुनता था तो बहुत शर्मिंदा होता था। मगर जब हम पदक जीतकर आए हैं तो मेरे अंदर ये भावना आई कि जो लोग बोलते थे कि हॉकी में पदक नहीं आता, उनके सामने हम बोल सकते हैं कि हां, हम मेडल लेकर आए हैं। ये मेरे लिए, मेरी टीम के लिए और पूरे देश के लिए गौरव की बात है।
सवाल- जब सेमीफाइनल का मुकाबला चल रहा था और स्कोर 5-4 का हो गया था, तब आप कैसा महसूस कर रहे थे?
जवाब- खेल के शुरू होने से पहले जब हम रूम पर थे तो बहुत ज्यादा नर्वस थे। मगर कहीं न कहीं एक्साइटमेंट भी थी कि 41 साल तक जो हमारे सीनियर खिलाड़ी नहीं कर सके वह करने का मौका मेरे और मेरी टीम के खिलाड़ियों के पास है। खेल के समय हमारे अंदर की जो फीलिंग थी वो आर या पार करने की थी। यह इसलिए क्योंकि हमें बाद में यह न सोचना पड़े कि काश ये हो जाता और वो हो जाता। मन में यही था कि जीतकर निकलना है, लेकिन परिस्थिति ऐसी हो गई कि आखिर छह मिनट में हमारी टीम के एक खिलाड़ी को कार्ड दे दिया गया, जिसके कारण हमें एक कम खिलाड़ी से खेलना पड़ा। यह विरोधी टीम का प्लस प्वाइंट हो गया। ओवरऑल हम काफी अच्छा खेले।
सवाल- जब आप मेडल जीतकर देश लौटे तो कैसा लगा, कितना प्यार मिला लोगों से, देश के लोगों से और गांव के लोगों से?
जवाब- देश के लोगों का भरपूर प्यार मिला, इतना सोचा भी नहीं था। हर जगह से फोन आ रहे थे। दोस्तों, परिवार, गांव और हॉकी चाहने वाले तमाम लोगों के फोन आ रहे थे। लोग अभी तक प्यार दे रहे हैं। मुझे नहीं लग रहा था कि वतन वापसी पर इतना कुछ होगा। पर ईमानदारी से कहूं तो देश के लोगों ने हद से ज्यादा प्यार दिया।
सवाल- अगर बात की जाय आपके सब्र की तो, यहां तक पहुंचने के लिए आपको किन किन समस्याओं का सामना करना पड़ा है?
जवाब- चाहे कोई भी खिलाड़ी हो, किसी भी फील्ड से हो, हर किसी की जिंदगी में संघर्ष आता है। मुझे भी बचपन में खाने पीने में दिक्कतें आईं। टाइम से खाना नहीं मिलता था। दरअसल, माता-पिता को नहीं पता था कि मैं प्रोफेशनल प्लेयर के तौर पर खेलने जाता हूं। उस समय किसी को पता नहीं होता है कि खेल-खेल में कौन कहां पहुच जाता है। शुरुआत में थोड़ी बहुत दिक्कतें आईं। उस समय मेरे गांव के एक कोच ने मेरा बहुत साथ दिया। गांव के जो कुछ पुराने हॉकी खिलाड़ी थे, उन सभी ने काफी मदद की। सबने थोड़ा-थोड़ा करके मदद की, जिसके कारण आज मैं यहां हूं। एक समय ऐसा भी आया, जब लग रहा था कि खेलना छोड़ दूं। पढ़ाई में भी उतना अच्छा नहीं था। परिवार में भी गरीबी थी तो फिर लगा कि हॉकी ही मुझसे कुछ करवा सकती है और इससे उबार सकती है। भगवान ने साथ दिया, गांववालों ने साथ दिया और मेरी मेहनत रंग लाई।
सवाल- जब आपने पहली बार हॉकी स्टिक उठाई थी तो आपकी उम्र क्या थी?
जवाब- जब पहली बार हॉकी स्टिक उठाई थी तो मुझे भी नहीं पता था कि मैं क्या करने जा रहा हूं। गांव-घर के झगड़े से बचने के लिए मेरे भाई ने मुझे खेलने के लिए भेजा था क्योंकि मैं बचपन में थोड़ा शरारती था। घर पर मेरी शिकायतें थोड़ी ज्यादा आती थीं। मम्मी बोलती थीं कि इसे खेलने के लिए ले जाओ। बस पता ही नहीं चला कि हॉकी से कब इतना प्यार हो गया। मेरे गांव के कोच ने शुरू से ही मेरी मदद की। इसलिए मैं हॉकी खेलना जारी रख सका। भगवान की दुआ से बस सबकुछ होता गया।
सवाल- भविष्य का क्या प्लान है?
जवाब- अगले साल एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स पर पूरा ध्यान है। हमारा मुख्य फोकस एशियन गेम्स पर है। हम चाहते हैं कि इसमें हम गोल्ड लेकर आएं। एशियन गेम्स में अगर गोल्ड आता है तो हम सीधे पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालिफाई हो जाएंगे। कॉमनवेल्थ गेम्स पर भी हमारा पूरा फोकस रहेगा। हम कॉमनवेल्थ गेम्स के सिल्वर मेडलिस्ट हैं। काफी समय से इसमें मेडल नहीं आया है तो हम इस बार चाहते हैं इसमें भी गोल्ड आए।
सवाल- घर में माता पिता का कैसा सपोर्ट मिला?
जवाब- मेरे माता पिता हों या किसी के माता पिता हों, वे बच्चे को सपोर्ट करते ही हैं। मां छुपा-छुपाकर पैसे देती थीं। मैं उनका बहुत लाडला था। पापा बीमार रहते थे। वो कुछ भी मजदूरी करते थे तो बीमार हो जाते थे। पापा के बीमार होने के कारण मां और भाई ने मेरी देखभाल की।
सवाल- जब भारतीय टीम ने हॉकी में पदक जीता तो पहली बार ऐसा हुआ कि भारत में क्रिकेट से ज्यादा हॉकी की चर्चा थी, वो आपको कैसा लगा?
जवाब- वह मेरे लिए बहुत गौरव का क्षण था। मैं भी क्रिकेट का जबरदस्त फैन था। आगे-पीछे क्रिकेट ही दिखता था। जब हमने देश के लिए पदक जीता तो एक टाइम ऐसा लग रहा था कि हमारी हॉकी अब उस जगह पर वापस आ गई है जहां पहले कभी थी। इतने वर्षों में कोई हॉकी को पूछता नहीं था, लेकिन पदक जीतने के बाद लोग हॉकी को इतना प्यार दे रहे हैं। आने वाले समय में हॉकी में पदक का कलर चेंज करेंगे।
सवाल- हरियाणा सरकार ने कितना सपोर्ट किया है?
जवाब- हरियाणा सरकार से बहुत ही ज्यादा सपोर्ट किया है। फाइनेंशियल तौर पर सरकार ने काफी मदद किया है। सरकार ने तो नियम भी बना दिया है कि आप मेडल लेकर आओ हम आपको पैसा देंगे। मेडल जीतने के बाद सरकार जितना पैसा देती है, उतना तो आम आदमी नॉर्मल लाइफ में भी नहीं कमा पाता है। हरियाणा सरकार का मैं धन्यवाद करना चाहूंगा कि वो खिलाड़ियों के लिए इतना सबकुछ कर रहे हैं।
सवाल- हॉकी में सुधार के लिए क्या सुझाव देना चाहेंगे?
जवाब- मेरा सुझाव यही है मैंने जो संघर्ष किया है, वह बाकी खिलाड़ी नहीं करें। जैसे मुझे ग्राउंड नहीं मिला, टर्फ नहीं मिला तो मैं सरकार से यही कहना चाहूंगा कि हरियाणा में और ज्यादा से ज्यादा टर्फ ग्राउंड बनाए जाएं, जिससे खिलाड़ी तैयारी हो सकें और देश के लिए अधिक से अधिक मेडल ला सकें।
सवाल- महिला हॉकी टीम भी टोक्यो ओलंपिक में बहुत अच्छा खेली, बेशक पदक नहीं जीती, इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब- मेडल से ज्यादा लड़कियों ने देश का दिल जीत लिया। बहुत ही गर्व की बात है। लगातार तीन मैच हारने के बाद जिस तरह से महिला टीम ने वापसी की वह काबिले तारीफ है। बड़ी-बड़ी टीम को हराकर सेमीफाइनल में पहुंचना अपने आप में बड़ी बात है। लड़कियों को सैल्यूट है।