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बर्थ-डे स्पेशल: ध्यानचंद को इसलिए कहते हैं जादूगर, केएल सहगल भी हार गए थे अनचाही शर्त

Wed, 29 Aug 2018 01:00 PM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Updated Wed, 29 Aug 2018 01:00 PM IST
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मेजर ध्यानचंद

किसी भी खिलाड़ी की महानता को नापने का सबसे बड़ा पैमाना है कि उसके साथ कितनी किंवदंतियां जुड़ी हैं। उस हिसाब से तो मेजर ध्यानचंद का कोई जवाब नहीं है। हॉलैंड में लोगों ने उनकी हॉकी स्टिक तुड़वा कर देखी कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं लगा है। जापान के लोगों को अंदेशा था कि उन्होंने अपनी स्टिक में गोंद लगा रखी है।

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हो सकता है कि इनमें से कुछ बातें बढ़ा-चढ़ा कर कही गई हों, लेकिन अपने जमाने में इस खिलाड़ी ने किस हद तक अपना लोहा मनवाया होगा इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है, जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं, मानों कि वो कोई देवता हों।

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गोलकीपरों के लिए चुनौती थे ध्यानचंद

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ध्यानचंद - फोटो : hindustan times

1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने वर्ल्ड हॉकी मैगजीन के एक अंक में लिखा था, "ध्यान के पास कभी भी तेज गति नहीं थी बल्कि वो धीमा ही दौड़ते थे। लेकिन उनके पास गैप को पहचानने की गजब की क्षमता थी। बाएं फ्लैंक में उनके भाई रूप सिंह और दाएं फ्लैंक में मुझे उनके बॉल डिस्ट्रीब्यूशन का बहुत फायदा मिला। डी में घुसने के बाद वो इतनी तेजी और ताकत से शॉट लगाते थे कि दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन गोलकीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता था।"

दो बार के ओलंपिक चैंपियन केशव दत्त ने हमें बताया कि बहुत से लोग उनकी मजबूत कलाईयों ओर ड्रिब्लिंग के कायल थे। "लेकिन उनकी असली प्रतिभा उनके दिमाग में थी। वो उस ढंग से हॉकी के मैदान को देख सकते थे, जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है। उनको बिना देखे ही पता होता था कि मैदान के किस हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंदी मूव कर रहे हैं।"

याद कीजिए 1986 के विश्व कप फुटबॉल का फाइनल। माराडोना ने बिल्कुल ब्लाइंड एंगिल से बिना आगे देख पाए तीस गज लंबा पास दिया था जिस पर बुरुचागा ने विजयी गोल दागा था। किसी खिलाड़ी की संपूर्णता का अंदाजा इसी बात से होता है कि वो आँखों पर पट्टी बाँध कर भी मैदान की ज्योमेट्री पर महारत हासिल कर पाए।

केशव दत्त कहते हैं, "जब हर कोई सोचता था कि ध्यानचंद शॉट लेने जा रहे हैं वो गेंद को पास कर देते थे। इसलिए नहीं कि वो स्वार्थी नहीं थे (जो कि वो नहीं थे) बल्कि इसलिए कि विरोधी उनके इस मूव पर हतप्रभ रह जाएं। जब वो इस तरह का पास आपको देते थे तो जाहिर है आप उसे हर हाल में गोल में डालना चाहते थे।"

1947 के पूर्वी अफ्रीका के दौरे के दौरान उन्होंने केडी सिंह बाबू को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ अपना मुंह मोड़ लिया और बाबू की तरफ देखा तक नहीं। जब उनसे बाद में उनकी इस अजीब सी हरकत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब था, "अगर उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने का कोई हक नहीं था।"

1968 में भारतीय ओलंपिक टीम के कप्तान रहे गुरुबख़्श सिंह ने मुझे बताया कि 1959 में भी जब ध्यानचंद 54 साल के हो चले थे, भारतीय हॉकी टीम का कोई भी खिलाड़ी बुली में उनसे गेंद नहीं छीन सकता था। 1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले एक अभ्यास मैच में भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई।

जब जर्मनी को दिखाया अपना जादू

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ध्यानचंद - फोटो : sportskeeda

ध्यान चंद अपनी आत्मकथा 'गोल' में लिखते हैं, "मैं जब तक जीवित रहूंगा इस हार को कभी नहीं भूलूंगा। इस हार ने हमें इतना हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं पाए। हमने तय किया कि इनसाइड राइट पर खेलने के लिए आईएनएस दारा को तुरंत भारत से हवाई जहाज़ से बर्लिन बुलाया जाए।"

दारा सेमी फाइनल मैच तक ही बर्लिन पहुंच पाए। जर्मनी के खिलाफ फाइनल मैच 14 अगस्त 1936 को खेला जाना था। लेकिन उस दिन बहुत बारिश हो गई। इसलिए मैच अगले दिन यानि 15 अगस्त को खेला गया। मैच से पहले मैनेजर पंकज गुप्ता ने अचानक कांग्रेस का झंडा निकाला। उसे सभी खिलाड़ियों ने सेल्यूट किया (उस समय तक भारत का अपना कोई झंडा नहीं था। वो गुलाम देश था इसलिए यूनियन जैक के तले ओलंपिक खेलों में भाग ले रहा था।)

बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40,000 लोग फाइनल देखने के लिए मौजूद थे। देखने वालों में बड़ौदा के महाराजा और भोपाल की बेगम के साथ साथ जर्मन नेतृत्व के चोटी के लोग मौजूद थे। ताज्जुब ये था कि जर्मन खिलाड़ियों ने भारत की तरह छोटे छोटे पासों से खेलने की तकनीक अपना रखी थी। हाफ टाइम तक भारत सिर्फ एक गोल से आगे था।

इसके बाद ध्यान चंद ने अपने स्पाइक वाले जूते और मोजे उतारे और नंगे पांव खेलने लगे। इसके बाद तो गोलों की झड़ी लग गई। दारा ने बाद में लिखा, "छह गोल खाने के बाद जर्मन रफ हॉकी खेलने लगे। उनके गोलकीपर की हॉकी ध्यान चंद के मुंह पर इतनी जोर से लगी कि उनका दांत टूट गया। उपचार के बाद मैदान में वापस आने के बाद ध्यान चंद ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए। सिर्फ जर्मन खिलाड़ियों को ये दिखाया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है।"

"इसके बाद हम बार-बार गेंद को जर्मन डी में ले कर जाते और फिर गेंद को बैक पास कर देते। जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है।" भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया और इसमें तीन गोल ध्यान चंद ने किए।

एक अखबार मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा, "बर्लिन लंबे समय तक भारतीय टीम को याद रखेगा। भारतीय टीम ने इस तरह की हॉकी खेली मानो वो स्केटिंग रिंक पर दौड़ रहे हों। उनके स्टिक वर्क ने जर्मन टीम को अभिभूत कर दिया।"

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ड्रिबलिंग करते थे ध्यानचंद?

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मेजर ध्यानचंद

ध्यानचंद के पुत्र और 1972 के म्यूनिख ओलंपिक खेलो में कांस्य पदक विजेता अशोक कुमार बताते हैं कि एक बार उनकी टीम म्यूनिख में अभ्यास कर रही थी तभी उन्होंने देखा कि एक बुज़ुर्ग से शख़्स एक व्हील चेयर पर बैठे चले आ रहे हैं। उन्होंने पूछा कि इस टीम में अशोक कुमार कौन हैं। जब मुझे उनके पास ले जाया गया तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया और भावपूर्ण ढ़ंग से अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में बताने लगे।।। तुम्हारे पिता इतने महान खिलाड़ी थे। उनके हाथ में 1936 के खबरों की पीली हो चुकी कतरनें थी, जिसमें मेरे पिता के खेल का गुणगान किया गया था।

ओलंपियन नंदी सिंह ने एक बार बीबीसी को बताया था कि लोगों में ये बहुत बड़ी गलतफहमी है कि ध्यान चंद बहुत ड्रिबलिंग किया करते थे। वो बिल्कुल भी ड्रिबलिंग नहीं करते थे। गेंद को वो अपने पास रखते ही नहीं थे। गेंद आते ही वो उसे अपने साथी खिलाड़ी को पास कर देते थे। भारत लौटने के बाद ध्यानचंद के साथ एक मजेदार घटना हुई। फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ध्यानचंद के फैन थे।

एक बार मुंबई में हो रहे एक मैच में वो अपने साथ नामी गायक कुंदन लाल सहगल को ले आए। हाफ टाइम तक कोई गोल नहीं हो पाया। सहगल ने कहा कि हमने दोनों भाइयों का बहुत नाम सुना है। मुझे ताज्जुब है कि आप में से कोई आधे समय तक एक गोल भी नहीं कर पाया। रूप सिंह ने तब सहगल से पूछा कि क्या हम जितने गोल मारे उतने गाने हमें आप सुनाएंगे?

सहगल राजी हो गए। दूसरे हाफ में दोनों भाइयों ने मिल कर 12 गोल दागे। लेकिन फाइनल विसिल बजने से पहले सहगल स्टेडियम छोड़ कर जा चुके थे। अगले दिन सहगल ने अपने स्टूडियो आने के लिए ध्यान चंद के पास अपनी कार भेजी। लेकिन जब ध्यान चंद वहां पहुंचे तो सहगल ने कहा कि गाना गाने का उनका मूड उखड़ चुका है। 

ध्यान चंद बहुत निराश हुए कि सहगल ने नाहक ही उनका समय खराब किया। लेकिन अगले दिन सहगल खुद अपनी कार में उस जगह पहुंचे जहां उनकी टीम ठहरी हुई थी और उन्होंने उनके लिए 14 गाने गाए। न सिर्फ गाने गाए बल्कि उन्होंने हर खिलाड़ी को एक-एक घड़ी भी भेंट की।

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