फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Sports ›   Hockey Player Rani Rampal and Indian Double Trap Shooter Ronjan Sodhi in Amar Ujala Samwad 2023 Uttarakhand

Amar Ujala Samvad 2023: रानी रामपाल और रोंजन सोढ़ी ने बताई ओलंपिक की कहानी, एक हारकर भी जीता तो दूसरे को मलाल

Mon, 19 Jun 2023 04:13 PM IST
शक्तिराज सिंह स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: शक्तिराज सिंह Updated Mon, 19 Jun 2023 04:13 PM IST
सार

अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ी रानी रामपाल और डबल ट्रैप शूटर रोंजन सोढ़ी ने अलग-अलग ओलंपिक से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।

विज्ञापन
Hockey Player Rani Rampal and Indian Double Trap Shooter Ronjan Sodhi in Amar Ujala Samwad 2023 Uttarakhand
रानी रामपाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी रानी रामपाल और डबल ट्रैप शूटर रोंजन सोढ़ी शामिल हुए। जिद और जुनून सत्र में दोनों ने अपने अनुभव साझा किए। टोक्यो ओलंपिक को लेकर बात करते हुए रानी ने कहा कि उसी टूर्नामेंट में लोगों ने महिला हॉकी को दिल से देखा। पहली बार लोग सुबह छह बजे उठकर महिला हॉकी के मैच देख रहे थे। हम शुरुआती तीन मैच हार गए थे और सभी की उम्मीदें हमसे खत्म हो गई थीं, लेकिन हमें पहले से पता था कि शुरुआती मैच हमारे लिए मुश्किल होंगे। ऐसे में हमने बाद के मैचों में अच्छा प्रदर्शन किया। वहीं, रोंजन सोढ़ी ने बताया कि लोगों की बातें सुनकर उनका ध्यान भटक गया था और वह पदक नहीं जीत पाए। उन्हें हमेशा इसका मलाल रहेगा। पढ़िए अमर उजाला के साथ दोनों की बातचीत के अंश...
विज्ञापन


आप टोक्यो के ओलंपिक सफर के बारे में बताएं।
रानी रामपाल:
टोक्यो ओलंपिक आप सभी ने देखा होगा। एक वही टूर्नामेंट था, जहां लोगों ने महिला हॉकी को दिल से देखा। उससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि लोग सुबह छह बजे उठकर महिला हॉकी के मैच देख रहे हैं। लोगों ने दिलचस्पी दिखाई कि महिला हॉकी वाकई कुछ अच्छा कर रही है। हॉलैंड, जर्मनी और इंग्लैंड के साथ हम शुरुआती मैच हार गए। सबने उम्मीद खो दी थी। हमें पता था कि ये मुश्किल मुकाबले थे। हॉलैंड तो 20 साल से अव्वल है। फर्स्ट हाफ में हम बराबरी पर थे, लेकिन बाद में 5-1 से हार गए। बाद के मैचों में हमारे पास क्वार्टर फाइनल तक पहुंचने का रास्ता था, लेकिन हमें भरोसा था। ऑस्ट्रेलिया के लिए सभी को लगता था कि वो तो जीतेगा। हमारे पास खोने को कुछ नहीं था। हमने सोचा कि देखेंगे बाद में जो होगा। हर सेकंड हमें लड़ना है, 60 मिनट तक लड़ना है। पेनल्टी कॉर्नर से गोल करने के बाद टीम में हौसला आया कि कैसे बढ़त को बनाए रखना है। सेमीफाइनल में अर्जेंटीना से हम हारे। वापस आने के बाद हमें देश के लोगों से वैसी इज्जत मिली, जैसी ओलंपिक पदक जीतने के बाद मिलती है। प्रधानमंत्री ने हमारा हौसला बढ़ाया। कोरोना के वक्त से हम यह सोच रहे थे कि हमें ऐसा काम करना है, जिससे लड़कियों के बीच संदेश जाएं। 
विज्ञापन


रोंजन आपके नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड है, लेकिन लंदन ओलंपिक की कसक आपके मन में होगी। ओलंपिक की ख्वाहिश होती है। क्या अनुभव रहा?
रोंजन सोढ़ी:
ओलंपिक का खेल बहुत मुश्किल होता है। यह क्रिकेट की तरह नहीं होता। यहां चार साल में एक मौका मिलता है और तीन ही पदक होते हैं। क्रिकेट में आज हार गए तो कल दूसरा मैच खेलेंगे। हमारे पास तो अगर स्वर्ण, रजत और कांस्य न हो तो कुछ नहीं मिलता। क्रिकेट में रिटायर होने के बाद भी मौके हैं, कमेंटेटर बन जाते हैं। हमारे साथ ऐसा नहीं है। लंदन में तीन राउंड का खेल था। वहां खेल मंत्री आए। हम जहां बैठते हैं, वहां किसी को आने की इजाजत नहीं होती। खेल मंत्री ने बोला कि उन्हें मुझसे मिलना है। कोच ने बताया। मैंने कहा कि मैं नहीं जाऊंगा। वे दोबारा आए। वे एक मिनट के लिए मिलना चाहते थे। जब मैं गया तो प्रोटोकॉल से बाहर चला गया। वहां मीडिया से किसी ने बोला कि ओबी वैन भेजिए रोंजन के घर पर, क्योंकि मेडल पक्का है। ...एक खामी रह गई। मैं वहां से हट गया था, प्रेशर में आ गया था। वह हमेशा जेहन में रहेगा कि पदक नहीं आ पाया। भारत में यही है कि ओलंपिक पदक नहीं है तो कुछ नहीं है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


शाहबाद मारकंडा में क्या खास है जो महिला हॉकी खिलाड़ी वहां से तैयार हो रही हैं।
रानी रामपाल:
मेरे कोच सरदार बलदेव सिंह का महिला हॉकी के लिए बड़ा योगदान रहा है। आप उनके बारे में पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि एक छोटे से कस्बे शाहबाद मारकंडा से 70 लड़कियां हॉकी में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। एक पंजाबी स्कूल से इसकी शुरुआत हुई थी। लड़कियों के लिए वहां सिर ढंकने का ड्रेस कोड था। मेरे कोच बलदेव लुधियाना से थे, लेकिन हरियाणा में काम करना चाहते थे। जब उन्होंने स्कूल मैनेजमेंट से कहा कि हम यहां कुछ शुरू करते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती का उन्होंने वहीं सामना किया। वे ड्रेस कोड से हटने को राजी नहीं थे। उन्होंने कुछ लोग ढूंढे, जिन्होंने स्कूल के लोगों को समझाया। पहले सूट में हॉकी हुई, फिर लोअर-टी-शर्ट में हुई। जब लड़कियां नेशनल्स में जाने लगीं तो स्थिति बदली। अब वहां से आठ से नौ लड़कियां भारत की कप्तानी कर चुकी हैं। 150 लड़कियां अलग-अलग सरकारी विभागों में नौकरी कर रही हैं। इनमें से कुछ लड़कियां ऐसे परिवारों से थीं, जहां तीन वक्त का खाना मिलना मुश्किल था। अब वे अच्छा जीवन जी रहे हैं।

देश में अधिकतर सफलताएं व्यक्तिगत संघर्ष से आईं हैं। भारत में खिलाड़ियों की सफलता में संस्थागत योगदान ज्यादा है या व्यक्तिगत जुनून का योगदान ज्यादा है।
रोंजन सोढ़ी:
अब तो काफी बदल चुका है। सरकारें भी सपोर्ट कर रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में खेल के क्षेत्र में बहुत विकास हुआ है। मैं फिरोजपुर से आता हूं, वहां कोई सुविधा नहीं थी। पिताजी ने दिल्ली भेज दिया। पंजाब में हॉकी का शौक है। डंडे का भी काम करती है। घुड़सवारी भी सीखी। बाद में शूटिंग सीखी। आज भी पंजाब में गन कल्चर है और यह बुरा नहीं, अच्छा गन कल्चर है। यहां शादी करने के लिए लड़के को ट्रैक्टर चलाना आना चाहिए और गोली चलाना आना चाहिए। ...अब खेलो इंडिया है, फंडिंग है। सरकार अब बहुत खर्च कर रही है। हर कॉर्पोरेट हाउस स्पॉन्सर कर रहा है। आने वाले वक्त में बहुत पदक आएंगे। 

रानी रामपाल: पहले सुविधाएं नहीं थीं, अब हैं। हमें सरकार सपोर्ट कर सकती है, पैसा दे सकती है, उपकरण दे सकती है। अगर आप में व्यक्तिगत जुनून नहीं है तो फंडिंग काम नहीं आएगी। अकेला जुनून है और संसाधन नहीं हैं तो भी काम नहीं हो सकता। 

रानी, आप हॉकी खिलाड़ी नहीं होतीं तो क्या होतीं?
रानी रामपाल:
वो मैंने कभी सोचा नहीं। खिलाड़ी नहीं होती तो मैं जिस पृष्ठभूमि से आती हूं, शायद मेरी 20-21 साल में शादी हो जाती। वहां हरियाणा में सोचते थे कि 10वीं तक पढ़ ली तो शादी करा दो। 


रोंजन, आप तो कॉमेडियन बनना चाहते थे। क्या राजनीति में जाएंगे?
रोंजन सोढ़ी:
शूटिंग में नहीं आता तो सुकना लेक के पास घर होता मेरा। राजनीति के बारे में अभी कुछ सोचा नहीं। 

खिलाड़ी बनने के लिए युवा क्या करें? रानी रामपाल और रोंजन सोढ़ी जैसे किस तरह बन सकते हैं?
रोंजन सोढ़ी:
खिलाड़ी के तौर पर मैं यह सीखा हूं कि आप हार को विनम्रता से स्वीकार करें और जीत को भी ऐसे ही स्वीकार करें। जब जीतें, तब विनम्र रहें। 

रानी रामपाल: हमारे कोच सिखाते थे कि कभी भी हार दिल पर न लगे और जीत दिमाग पर न चढ़े। हमने बचपन से यही सीखा है कि कैसे एक लक्ष्य हासिल करें, फिर दूसरे पर जाएं। हर किसी की जिंदगी में कोई न कोई दिक्कत है या चुनौती है। हर दिन एक नई चुनौती है, लेकिन जिंदगी में हार नहीं मानना चाहिए। हार मान ली तो आपको उठाने वाला कोई नहीं होगा। गिराने वाले बहुत मिल जाएंगे, खुद को उठाने वाले आप खुद ही होंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all Sports news in Hindi related to live update of Sports News, live scores and more cricket news etc. Stay updated with us for all breaking news from Sports and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed