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शरीर से बाहर शूक्ष्म शरीर की सत्ता
टीम डिजिटल
Updated Mon, 18 Nov 2013 12:55 PM IST
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वेदांत कहता है कि "माया" परमसत्ता की एक बीजशक्ति है, जिसके अनेक नाम और रूप हैं। जिस प्रकार से आप उष्मा अग्नि से अलग नहीं कर सकते ठीक उसी प्रकार से माया भी ब्रह्मतत्व (प्रकृ्ति) से भिन्न नहीं है। इसके तीन गुण हैं सत्,रज और तम। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इन पांचों तत्वों के द्वारा किसी नवीन उत्पति की क्रिया में यही तीन गुण माया द्वारा क्रियाशील रहते हैं।
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इन पांचों तत्वों में जब सात्विक अंश की प्रधानता रहती है तो आकाश से श्रोत यानी शब्द, वायु से स्पर्श,अग्नि से नेत्र,जल से जिह्वा और पृथ्वी से घ्राण यानी गंध नाम वाली पांचों ज्ञानेन्द्रियां बनती हैं। इन्ही से बुद्धि, मन, चित्त और अहंकार जैसी मानसिक कृतियां उत्पन होती हैं। जिनमें ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों का प्रेरक बनता है मन।
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इन्ही पांचों तत्वों से निर्मित हमारी इस स्थूल देह का नाम है अन्नमय कोश जो कि मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है। शरीर में स्थित पांच वायु और पांच कर्मेंन्द्रियों के योग का नाम है प्राणमय कोष।
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पांचों ज्ञानेनिद्रियों के योग को कहा गया है मनोमय कोष तथा बुद्धितत्व युक्त पंच ज्ञानेंद्रियों को विज्ञानमय कोष। अंतिम कोष सत्वगुणी अविद्या से संचालित आनंदमय कोष है, लेकिन आत्मा जो है वो इन सबसे एक अलग सत्ता है।
वैदिक दृष्टि के अनुसार मृत्यु के पश्चात भी न मरने वाला सूक्ष्म शरीर पांच ज्ञानेन्द्रियों, पांच कर्मेंद्रियों, पांच प्राण, एक मन और एक बुद्धि के योग से बना है। यही वह सूक्ष्म शरीर है जो कि प्रारब्ध और संचित कर्मों के कारण मृत्यु पश्चात बार बार जन्म लेता है। ऐसा नहीं है कि सूक्ष्म शरीर की ये अवधारणा सिर्फ भारतीय है बल्कि "इजिप्टियन बुक ऑफ द डेड" में भी सूक्ष्म शरीर के बारे में विचार प्रकट किए गए हैं।
आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के डा. सेसिल ने भी प्रयोगों के आधार पर एक निष्कर्ष निकाला था कि स्थूल शरीर के समानांतर किसी एक सूक्ष्म शरीर की सत्ता है, जो कि सभी प्रकार के सांसारिक बंधनों के बावजूद कभी कभी शरीर को छोडकर दूर चली जाती है, हालांकि एक सुनहले रंग के सूक्ष्म तार के माध्यम से ये हर हाल में हमारे इस स्थूल शरीर की नाभि से जुडी रहती है।
जब कभी यह सुनहला तार किसी कारणवश टूट जाता है तो उस सूक्ष्म सत्ता का स्थूल शरीर से फिर कोई संबंध नहीं रह जाता और यही किसी व्यक्ति की आकस्मिक मृत्यु का कारण बनता है। आज विश्व के वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोजों के आधार पर ये कहा जाता है कि अणु के भीतरी भाग में एक तरह की नियति या कहें कि शून्य है।
अणु के भीतर इस शून्य के द्वारा ही सूक्ष्म शरीर की रचना होती है। परन्तु एक शून्य द्वारा उत्पन सूक्ष्म शरीर द्वारा स्थूल शरीर को छोडकर चले जाना ही आज के वैज्ञानिकों के सामने एक बडी पहेली है। लेकिन यदि वेदांत का आश्रय लिया जाए तो शायद इस पहेली को सही रूप में आसानी से सुलझाया जा सकता है।
इन आधारों पर यह कहने में कोई संकोच नहीं हो सकता है कि विज्ञान शायद पुनर्जन्म की इस पहेली को जल्द ही सुलझा ले; लेकिन इस विषय में मेरा तो ये मानना है कि विज्ञान चाहे किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचे किन्तु अन्त में उसे हमारे विचारों का समर्थन करना ही होगा। हां, ये हो सकता है भले ही उनकी भाषा अद्वैत वेदांत की गूढ भाषा से भिन्न हो।