छिड़ने लगी है बहस, अब कैसे बनेगी जन्मकुण्डली
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जन्मकुण्डली के बारे में सवाल नया तो नहीं है कि जन्म समय से मानें या जातक के गर्भ में आने के समय से। नया नही होते हुए भी नए सिरे से प्रश्न उठा है क्योंकि ज्योतिष के हिसाब से शुभ ग्रह योगों में जन्म के लिए समाज के एक तबके में सीजेरियन प्रसव कराने का दौर चल पड़ा है।
बंगलुरु में गत वर्ष सितंबर के तीसरे सप्ताह में हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में जर्मनी की लारा डंकन ने एक शोध पत्र पढ़ा। उसमें गर्भाधान के समय की कुंडली और जन्म समय की 135 अलग-अलग कुंडलियों का तुलनात्मक अध्ययन पेश किया गया। सम्मेलन में पहुंचे देश-विदेश के 45 ज्योतिर्विदों ने सहमति जताई कि शुरुआती तौर पर जन्म समय के साथ गर्भाधन के समय की कुण्डली भी देखी जानी चाहिए।
दिक्कत यह है कि गर्भाधान का समय जांचना मुश्किल है। इतना मुश्किल की उसे असम्भव भी कह सकते हैं। वैसे, विज्ञान भी तो कहता है कि बच्चा जन्म के पहले से ही सीखने लगता है। गर्भाधान के चार छह सप्ताह बाद ही। इतिहास पुराण ग्रंथों के प्रसंगों पर नजर दौड़ाएं तो महाभारत के अनुसार अभिमन्यु जब मां के गर्भ में थे तभी चक्रव्यूह में घुसना सीख गए थे।
अर्जुन उस समय सुभद्रा को चक्रव्यूह के बारे में बता रहे थे। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार जब तीन माह का गर्भ हो जाता है, तब से बच्चे का निर्माण शुरू हो जाता है। बस यहीं से गर्भ पर ग्रहों का प्रभाव पड़ने लग जाता है। उन दिनों जन्मकुण्डली के आधार समय को ले कर कोई बहस नहीं थी। लेकिन उन दिनों भी ग्रहण वगैरह के समय गर्भवती महिलाएं अतिरिक्त सावधानी रखती थी।
कहा जाता है कि ग्रहण काल में किसी तरह के धारदार घरेलू औजारों का प्रयोग नहीं करना चाहिए यथा सब्जी काटना, कैंची से कोई भी वस्तु काटना या कपड़ा सिलना आदि काम से बचना चाहिए। जहाँ तक हो सके उत्तम साहित्य पढ़ना चाहिए। इन मान्यताओं के आधार पर भी लारा और उनके सहयोगी ज्योतिर्विद जन्मकुण्डली के समय के बारे में पुनर्विचार की पेशकश करते हैं।