निर्भया ने अपनी जान व्यर्थ में नहीं गंवाई?
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निर्भया का अर्थ है निडर। हम ऐसा क्या कर सकते हैं जिससे महिलाएं वास्तव में डर के बिना समाज में जी सकती हैं? निर्भया ने अपनी जान व्यर्थ में नहीं गंवाई। उसके कारण समाज में बहुत जागरूकता और जागृति आयी जो कि महिलाओं की सुरक्षा के उपाय निकालने के लिए आवश्यक है।
उसने कई लड़कियों की अनकही कहानियों को व्यक्त करने का प्रतिनिधित्व किया जो कि अनसुनी रह गयी थीं। यह अभी हुई घटना नहीं है। अतीत में द्रौपदी और सीता जैसी शक्तिशाली महिलाओं को भी अपमान और बहुत कुछ सहना पड़ा था। किसी भी तरह का अन्याय और अधिकारों का हनन मूल्यों के पतन का एक स्पष्ट संकेत है।
हमें इस समस्या की जड़ को संबोधित करना चाहिए और इसका एक ही रास्ता है - लोगों को नैतिकता और मानवीय मूल्यों की शिक्षा देना। परन्तु आजकल के स्कूलों में भी नैतिक विज्ञान जैसे विषय को दरकिनार करके रखा गया है।
शास्त्रों में छः मुख्य विकार बताये गए हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। इनमें से कोई भी एक हमारे पतन का कारण बन सकता है। उनके दुष्प्रभाव से संरक्षण करने और बांटने के गुण क्षीण हो जाते हैं। ऐसी घटनाओं के होने का यही मुख्य कारण है।
आप इन विकारों को कैसे रोक सकते हैं? इसमें अध्यात्म सहायक है। इससे अपनी और जीवन की एक व्यापक दृष्टि मिलती है जो हमें आंतरिक शक्ति, शांति और स्पष्ट विचारधारा देती है।
संशय और असुरक्षा के द्वारा उभरने वाले यह विकार केवल प्राण ऊर्जा की कमी का संकेत हैं। समाज की निष्क्रियता भी कम प्राण होने का एक संकेत है। हम न ही शीघ्र निर्णय ले पाते हैं और न ही कुछ करने में सक्षम होते हैं जिसका परिणाम टालना और पछतावा रहता है।
जब समाज में कम प्राण रहता है तब योग और ध्यान जैसे सरल साधना की तकनीकों के माध्यम से समाज में 'सत्व' (पवित्रता, शांति, सकारात्मक ऊर्जा) को बढ़ाया जा सकता है और इससे स्वाभाविक रूप से अपराध समाप्त हो जाते हैं।
हमारे शरीर में सात ऊर्जा केन्द्र या "चक्र" हैं। अलग अलग चक्रों में ऊर्जा प्रवाह के परिणामस्वरूप सकारात्मक या नकारात्मक भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। ऊर्जा की उर्ध्वगामी गति से सकारात्मक गुण अभिव्यक्त होते हैं। ऊर्जा के स्तर में कमी या उसकी अधोगति के परिणामस्वरूप काम, लोभ और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसी लिए ऊर्जा के स्तर को ऊपर उठाना बहुत महत्वपूर्ण है।
ऐसा करने से निम्न ऊर्जाओं को रचनात्मकता में परिवर्तित किया जा सकता है। समाज में कला और संस्कृति भी ऐसा करने में सहायक हैं और उनको बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसी लिए प्राचीन समय में सभी बच्चों को कला, संगीत या नृत्य के किसी न किसी रूप को सिखाया जाता था। त्योहारों के द्वारा भी समाज की ऊर्जा का स्तर ऊपर बना रहता है जिससे समाज में अपनेपन की भावना बनी रहती है।
अपने प्राचीन ज्ञान को पुनर्जीवित करके समाज के नवीनीकरण का अब समय आ गया है। स्त्री और पुरुष दोनों को एक साथ आगे आकर जिम्मेदारी लेनी होगी। माँ, बहन, साथी, पत्नी सभी ही भूमिकाओं में महिलाओं को मूल्यों को बरकरार रखना सुनिश्चित करना होगा। महिलाओं को सही समय पर उचित मूल्य आधारित समग्र शिक्षा प्राप्त करने की आवश्यकता है। उनको नकारात्मक भावनाओं और तनाव से निपटने के गुर सीखने की आवश्यकता है।
जब घर की स्त्री तनावग्रस्त है, माँ तनावग्रस्त है, तब उसका असर पूरे घर पर और बच्चों पर दिखेगा। यही बात पुरुषों के लिए भी लागू है । यह सही समय है। हमें समाज के निम्न वर्गों से लेकर ऊँचे वर्गों तक के बच्चों में मानवीय मूल्यों और सकारात्मक गुणों को पैदा करके समाज के प्राण स्तर और सत्व की वृद्धि करनी होगी। "ऐसा नहीं करो" बोलने की जगह हमें उन्हें समाधान देना होगा ।
हम अतीत को नहीं बदल सकते, लेकिन उससे सीख लेते हुए हमें इस तरह के जघन्य अपराधों को रोकने और उन्मूलन करने के सकारात्मक कदम उठाने होंगे। इसके लिए अध्यात्म एक स्पष्ट उत्तर है। योग और ध्यान किसी विशिष्ट वर्ग के लिए नहीं हैं। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों का ही आधार है। यदि हम वास्तव में अपनी बेटियों को स्वतंत्र और खुश रखना चाहते हैं तो यह अब हमारे समाज की एक आवश्यकता है।
लेखिका अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन की अध्यक्षा, ध्यान शिक्षिका, और आर्ट ऑफ़ लिविंग फाउंडेशन के महिला और बाल कल्याण कार्यक्रमों की निदेशिका हैं।