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ईश्वर की प्रार्थना क्यों और इससे क्या लाभ मिलता है?
डॉ० प्रणव पण्ड्या/शांतिकुंज, हरिद्वार
Updated Wed, 17 Dec 2014 12:20 PM IST
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जब ईश्वर सर्व शक्तिमान है, सर्वत्र संव्याप्त है, अपरिमित है, सर्वज्ञ है, तो फिर अपनी प्रार्थना के द्वारा हम उसको सूचना क्यों देते है? वस्तुतः हमें जो कुछ स्रष्टा से प्राप्त हुआ है, उसके लिए प्रार्थना के द्वारा उस सर्वशक्तिमान के प्रति हम अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करते है। परंतु वाणी की अपेक्षा कृत्यों के द्वारा कृतज्ञता का प्रदर्शन करना आम होता है। ऐसा करने से हमें उच्चस्तरीय दैवी अनुदान एवं वरदानों की प्राप्ति संभव हो सकेगी।
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ईश्वर की आज्ञाओं पर चलना ही सच्ची प्रार्थना और पूजा है। उसकी आज्ञा मानना ही उसके प्रति प्रेम है। प्रख्यात मनोवेत्ता डॉ० एमेली केडी के अनुसार प्रार्थना मात्र परमात्मा को धन्यवाद देने, कोरी कृतज्ञता व्यक्त करने या उससे कुछ याचना करने की प्रक्रिया का नाम नहीं है, वरन् यह वह मनःस्थिति है, जिससे व्यक्ति शंका और संदेहों के जाल-जंजाल में से निकलकर श्रद्धा की भूमिका में प्रवेश करता है।
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अपने अहं को गलाकर समर्पण की नम्रता स्वीकार करता और उद्धत-उच्छृंखल मनोविकारों को ठुकराकर परमेश्वर का नेतृत्व स्वीकार करने का नाम प्रार्थना है। श्रद्धा, विश्वास एवं भावना की गहनता ही प्रार्थना को फलवती बनाते हैं। छांदोग्योपनिषद में उल्लेख है, ‘‘यदेव श्रद्धया जुहोति तदेव वीर्यवत्तरं भवेति’’अर्थात् श्रद्धापूर्वक की गई प्रार्थना ही फलवती होती है। अतः भावना जितनी सच्ची, गहरी और श्रद्धापूर्ण होगी, उतना ही उसका सत्परिणाम भी होगा। प्रार्थना यदि भावनापूर्ण है तो वह बिना पूजा-साधना के भी उतनी ही प्रभावशाली हो सकती है। जितनी कि विधि-विधान के साथ किए गए नियमित उपासना-साधना की।
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प्रार्थना एक प्रकार का प्रायश्चित है। अध्यात्म शास्त्रों में जितने प्रकार के प्रायश्चितों का उल्लेख है, उन सब में प्रार्थना सबसे अधिक शक्तिशाली है। प्रार्थना के द्वारा हम अपने अहंकार, पाप, कषाय-कल्मष एवं दुखों के अंधकार को छिन्न-भिन्न कर सकते हैं और अंतर्मन में छिपी हुई दुर्भावनाओं, दुराग्रहों एवं समस्त कमजोरियों का मूलाच्छेदन कर सकते हैं। मन को साधने एवं शिक्षित करने की सबसे पहली सीढ़ी प्रार्थना है।
ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करने में प्रार्थना से बढ़कर और कोई साधना-मार्ग नहीं है। सूर, तुलसी, मीरा, तुकाराम, समर्थ रामदास, चैतन्य महाप्रभु, नरसी भगत आदि संत महात्माओं की प्रार्थनाएं प्रख्यात है। श्रद्धा-भक्ति से ओत-प्रोत होकर हृदय की गहराई से विश्वासपूर्वक थोडे़ समय के लिए भी की गई प्रार्थना उतना ही प्रतिफल प्रदान करती है जितना कि योगी, यती, तपस्वी लंबे समय तक कष्ट साध्य साधना-तपश्चर्या के द्वारा प्राप्त करते हैं।
सच्ची प्रार्थना से अंतरात्मा के गहनतर भाग से एक आंतरिक दिव्य चैतन्य प्रकाश प्रस्फुटित होता है, जिसके लिए शास्त्रों में कहा गया है, ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’। अर्थात् यही वह गुढ़ आंतरिक प्रकाश है, जो जगत् के समस्त चराचर प्राणियों को आलोक प्रदान करता है। प्रार्थना असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाली दिव्य प्रभा है।