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कलियुग में हुए राम लक्ष्मण के दर्शन

Tue, 13 Aug 2013 09:40 AM IST
राकेश/इंटरनेट डेस्क
राकेश/इंटरनेट डेस्क Updated Tue, 13 Aug 2013 09:40 AM IST
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tulshi das jyanti

भगवान राम के दर्शन आज भी हो सकते हैं। लेकिन जरूरत है तो ऐसी भक्ति और श्रद्घा की जैसी भक्ति भावना तुलसीदास में थी। इसी भक्ति और आस्था के बल पर तुलसीदास जी ने कलियुग में भगवान राम और लक्ष्मण जी के दर्शन प्राप्त किए थे।

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तुलसीदास जी के विषय में जो साक्ष्य मिलते हैं उसके अनुसार इनका जन्म 1554 ईश्वी में श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ था। आज इनका जन्मदिवस है। तुलसी दास जी को भगवान राम की भक्ति की प्रेरणा इनकी पत्नी रत्नावली से प्राप्त हुई थी। राम की भक्ति में तुलसीदास ऐसे डूबे की दुनिया जहान की सुध न रही।
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तुलसी दास भगवान की भक्ति में लीन होकर लोगों को राम कथा सुनाया करते थे। एक बार काशी में रामकथा सुनाते समय इनकी भेंट एक प्रेत से हुई। प्रेत ने इन्हें हनुमान जी से मिलने का उपाय बताया। तुलसीदास जी हनुमान जी को ढूंढते हुए उनके पास पहुंच गए और प्रार्थना करने लगे कि राम के दर्शन करवा दें।
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हनुमान जी ने तुलसी दास जी को बहलाने की बहुत कोशिश की लेकिन जब तुलसीदास नहीं माने तो हनुमान जी ने कहा कि राम के दर्शन चित्रकूट में होंगे। तुलसीदास जी ने चित्रकूट के रामघाट पर अपना डेरा जमा लिया। एक दिन मार्ग में उन्हें दो सुंदर युवक घोड़े पर बैठे नज़र आए, इन्हें देखकर तुलसीदास जी सुध-बुध खो बैठे। जब युवक इनके सामने से चले गए तब हनुमान जी प्रकट हुए और बताया कि यह राम और लक्ष्मण जी थे।

कितनी सच्चाई है राम और रामायण की कथाओं में


तुलसीदास जी पछताने लगे कि वह अपने प्रभु को पहचान नहीं पाए। तुलसीदास जी को दुःखी देखकर हनुमान जी ने सांत्वना दिया कि कल सुबह आपको फिर राम लक्ष्मण के दर्शन होंगे। प्रातः काल स्नान ध्यान करने के बाद तुलसी दास जी जब घाट पर लोगों को चंदन लगा रहे थे तभी बालक के रूप में भगवान राम इनके पास आए और कहने लगे कि "बाबा हमें चंदन नहीं दोगे"।

रावण की मृत्यु से पहले हुई थी यह घटना

हनुमान जी को लगा कि तुलसीदास जी इस बार भी भूल न कर बैठें इसलिए तोते का रूप धारण कर गाने लगे 'चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर। तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥' तुलसीदास जी बालक बने राम को निहारते-निहारते सुध-बुध खो बैठे और भगवान राम ने स्वयं तुलसीदास ही का हाथ पकड़कर तिलक लगा लिया और खुद तुलसीदास जी के माथे पर तिलक लगाकर अन्तर्धान हो गए।

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