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भगवान का मंदिर है काया, शरीर को मंदिर की तरह दें महत्व

Sun, 13 May 2018 11:11 AM IST
सदगुरु
सदगुरु Updated Sun, 13 May 2018 11:11 AM IST
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temple is god body and the body is the temple of god

शरीर को ईश्वर का पवित्र निवास मानना उचित है। शरीर रूपी मंदिर को बुरी आदतों से रुग्ण बनाना प्रकृति की दृष्टि से बड़ा अपराध है। नतीजतन पीड़ा, बेचैनी, अशक्ति, अल्पायु, आर्थिक हानि, तिरस्कार जैसे दंड भोगने पड़ते हैं। आहार-विहार के असंयम से शरीर के भीतरी अंगों पर भारी आघात पड़ता है। उससे वे दुर्बल एवं रोग ग्रस्त होने लगते हैं। शरीर को निरोगी रखना कठिन नहीं है। उसके लिए आहार, श्रम एवं विश्राम का संतुलन बनाना भर जरूरी है। आलस्य रहित, श्रमयुक्त व्यवस्थित दिनचर्या का निर्धारण कठिन नहीं है। शरीर को मंदिर की तरह महत्व दें। उसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं सक्षम बनाना अपना पुण्य कर्तव्य मानें। उपवास द्वारा स्वाद एवं अति आहार की दुष्प्रवृत्तियों पर अधिकार पाने का प्रयास करें। फिर इसी शरीर से वे लाभ पाए जा सकते हैं, जिन्हें ऋषियों और वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है। 

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