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सीख: सफलता के पैमाने सबके लिए एक नहीं होते, पर सम्मान सबका जरूरी है

संपादकीय डेस्क, अमर उजाला Updated Mon, 20 Aug 2018 02:59 PM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
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कार्णिक की कहानी, जिसने मधुरिमा को एहसास दिलाया कि ऑटो चलाना उसकी पसंद का काम है।
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कार्णिक चौदह साल की उम्र से ऑटो चलाता था। दरअसल आठवीं में फेल हो जाने के बाद उसके पिता ने उसे ऑटो दिला दिया था। एक दिन वह सवारी की तलाश में घूम रहा था, तभी उसकी बचपन की दोस्त मधुरिमा ऑटो ढूंढती दिखाई दी। पहले उसे संकोच हुआ, फिर उसने मुस्कराते हुए मधुरिमा के सामने ऑटो रोका।

मधुरिमा कार्णिक को देख हैरान हो गई। उसने पूछा, कार्णिक, तुम आठवीं के बाद कहां गायब हो गए थे? आज तुम मिले भी, तो ऑटो चलाते हुए? कार्णिक बोला, आज तुमसे मिलने के बाद याद आया कि स्कूल छोड़े इतने साल बीत गए। मधुरिमा ऑटो में बैठ गई। कार्णिक ने पूछा, क्या चल रहा है आजकल? मधुरिमा बोली, मैंने आज ही से एक आईटी कंपनी में नौकरी शुरू की है। पंद्रह हजार सैलरी है। कार्णिक बोला, वाह, चलो मिठाई खिलाओ।

मधुरिमा बोली, पर तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। तुमने पढ़ाई क्यों छोड़ दी? कार्णिक ने फिर अनसुनी करते हुए कहा, सामने एक बहुत अच्छी आइसक्रीम शॉप है। तुम्हे आइसक्रीम बहुत पसंद है न। चलो, तुम्हें आइस्क्रीम खिलाता हूं। कार्णिक ने ऑटो आइस्क्रीम की दुकान पर रोका। मधुरिमा ने कहा, कार्णिक, तुम अपनी पढ़ाई अब भी पूरी कर सकते हो। मैं तुम्हारी मदद करूंगी। कार्णिक आइसक्रीम की दुकान में रखी सौंफ मधुरिमा की आइसक्रीम पर डालने लगा।

मधुरिमा चिल्लाई, यह क्या कर रहे हो? मुझे सौंफ नहीं चाहिए। लगातार अनुरोध के बावजूद वह सौंफ लेने के लिए तैयार नहीं हुई। कार्णिक बोला, जैसे तुम्हारी पसंद-नापसंद की अहमियत है, वैसे ही मेरी भी पसंद-नापसंद की होनी चाहिए न। आज मेरे पास तीन ऑटो हैं और मैं महीने में पचास हजार कमा लेता हूं। चलो, अब मेरी खुशी में मेरा साथ दो। मधुरिमा को बात समझ में आ गई।

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