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कभी-कभी हमसे जाने-अनजाने में अच्छे काम भी हो जाते हैं

Sun, 15 Apr 2018 01:50 AM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 15 Apr 2018 01:50 AM IST
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story of a teacher who helped a hungry farmer family
प्रतीकात्मक तस्वीर

एक शिक्षक की कहानी, जिसने मजाक-मजाक में एक भूखे किसान परिवार की मदद की।

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अयान अपने स्कूल की तरफ से पिकनिक पर गया था। स्कूली बच्चे शहर से कोसों दूर पिकनिक मनाने गए थे। आसपास छोटे-छोटे गांव बसे हुए थे। खेलते-खेलते अयान और उसके दोस्त काफी आगे निकल गए। जब कुछ देर तक वे वहां नजर नहीं आए, तो उनके शिक्षक भास्कर उन्हें ढूंढने निकल पड़े। भास्कर ने देखा, अयान और उसके दोस्त किसी किसान के सामान के साथ खेल रहे हैं। जब वह वहां पहुंचे, तो अयान और उसके दोस्त किसान के जूतों को टटोल रहे थे।

उन्होंने ने पूछा, तुम लोग क्या कर रहे हो? अयान बोला, सर हम इन जूतों में मिट्टी भर रहे हैं। जब किसान आएगा और वह इन जूतों को पहनेगा, तो उसके पैर गंदे हो जाएंगे और हमें मजा आएगा। भास्कर बोले, ऐसा करने से तो उसके जूते पहनने लायक भी नहीं बचेंगे। चलो, हम कुछ अलग तरीके से मजे करते हैं। बच्चे यह सुनकर एकदम खुश हो गए। शिक्षक और बच्चों ने मिलकर अपने टिफिन का सारा खाना एक पॉलिथीन में लपेटकर उन जूतों के अंदर छुपा दिया।
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तभी उन्हें किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। वे सब छिपकर देखने लगे। उन्होंने देखा, एक किसान आया और जूतों में पैर डालने ही वाला था कि उसने उससे बाहर निकलती गुलाबी पॉलिथीन देखी। उसने वह पॉलिथीन निकाली, तो देखा कि उसमें ढेर सारा खाना रखा हुआ है। उसने खाना सूंघ के देखा, खाना एकदम ताजा था। उसने पलट कर इधर-उधर देखा और खूब अवाजें लगाई कि किसने वह खाना जूतों में रखा। शिक्षक और बच्चे चुपचाप देखते रहे।
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वह किसान वहीं जमीन पर बैठ गया और रोने लगा। उसे रोते देख शिक्षक भास्कर दीवार के पीछे से निकले और उसके कंधे पर हाथ रखा। किसान भास्कर के चरणों में गिर गया और बोला, साहब, आप को ऊपर वाले ने ही आज यहां भेजा है। मेरी बीवी-बच्चे पिछले एक हफ्ते से भूखे हैं। आपके इस उपकार से हम दो दिन पेट भरकर खाना खा पाएंगे। शिक्षक ने उसे कुछ पैसे भी दिए।

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