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अपनी हंसी पर गौर कीजिए क्या कभी ऐसे हंसते हैं?
अध्यात्मिक गुरू/ श्री श्री रविशंकर
Updated Tue, 07 Jan 2014 01:20 PM IST
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यदि आपका कभी ईश्वर से मिलना हो तो जानतें है आप उन्हें क्या कहेंगे? ‘‘अरे! मैं तो अपने भीतर आपसे मिल चुका हूं। ‘‘ईश्वर आप में नृत्य करते हैं, उस दिन जिस दिन आप हंसते और प्रेम में होते हो।
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सुबह हंसना ही सच्ची प्रार्थना है। सतही हंसना नही बल्कि अंदर की गहराई से हंसना। हंसना आपके भीतर से आपके हृय से आती है। सच्ची हंसी ही सच्ची प्रार्थना है। जब आप हंसते हो तो सारी प्रकृति आपके साथ हंसती है। यही हंसी प्रतिध्वनि होती है और गूंजती है, यही वास्तविक जीवन है।
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जब सब कुछ आपके अनुसार हो रहा हो तो कोई भी हंस सकता है, लेकिन जब आपके विपरीत हो रहा हो और आप हंस सके तो समझो विकास हो रहा है। तो आपके जीवन में आपकी हंसी से मूल्यवान और कुछ नही। चाहे जो हो जाए इसे किसी के लिये खोना नही है।
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घटनाएं आती हैं और जाती है। कुछ तो सुखद होंगी और कुछ दुखद, लेकिन जो कुछ भी हो आपको वे छु न पाएं। आपके अस्तित्व के भीतर ऐसा कुछ है जो कि अनछुआ है। उस पर ही रहें जो अपरिवर्तनशील है। तभी आप हंसने के योग्य होंगे।
हंसने में भी भेद है। कभी कभी आप अपने आपको नही देखने के लिए या कुछ सोचने से बचने के लिए हंसते हो। लेकिन जब आप हर क्षण यह देखते हो और अनुभव करते हो कि जीवन हर क्षण है और जीवन का हर क्षण अपराजेय है तो आपको कोई परेशान नही कर सकता।
आपने एक नवजात को देखा होगा, छ माह का या एक वर्ष का। जब वे हंसते हैं तो उनका पूरा शरीर हिलता और कूदता है। उनकी हंसी उनके मुंह से ही नही आती, उनके शरीर का हर एक कण हंसता है। यह समाधि है। यह हंसी अबोध है, शुद्घ है, बिना किसी तनाव की है। हमें अपने अंदर ऐसी ही हंसी तलाशनी चाहिए।