क्या रास रचाते कृष्ण को कामासक्त बनाने में सफल हुए कामदेव?
शरद ऋतु की पूर्णिंमा की रात्रि अद्भुत है। इसी रात में रासलीला का आयोजन किया था भगवान श्री कृष्ण ने क्योंकि बेला, चमेली, आदि सुगंधित फूलों की महक वातावरण को महका देती है।
भगवान ने चीर हरण के समय गोपियों को जिन रात्रियों का संकेत दिया था, वे मानों सब की सब पूंजीभूत होकर एक ही रात्रि में उल्लासित हो रही थी। भगवान ने भी योगमाया के सहारे उन्हें निमित्त बनाकर रस क्रीड़ा करने का संकल्प किया।
डोगरे महाराज रासलीला के गूढ़ सिद्धांत को समझाते हैं। पहला इसमें गोपी के शरीर के साथ कुछ लेना देना नहीं है। इसमें लौकिक काम नहीं है। यह जीव और ईश्वर का मिलन है।
कहते हैं कि कामदेव ने कृष्ण को चुनौती देकर कहा कि पुष्पबाण चलाऊंगा। उसके प्रभाव में आए तो मैं जीता, निर्विकार रहें तो आप। कृष्ण तो ठहरे परात्पर ब्रह्म। उन्होंने चुनौती स्वीकार की।
गोपियां को लगने लगा कृष्ण उनके प्रति आसक्त हैं
रास शुरु हुआ। कहते हैं कि उस रास में शामिल गोपियां मानने लगीं कि कृष्ण उनके प्रति आसक्त हैं। ऐसा लौकिक भाव जागने पर श्रीकृष्ण अदृश्य हो गए।
जीव की आंखों पर अभिमान का पर्दा छा जाने से प्रभु दिखाई नहीं देते। वे उन्हें ढूंढती हुई गई। देखा आगे अंधकार है। प्रभु की कृपा हुई तो गोपियों का मन कृष्णमय हो गया।
उनकी वाणी से कृष्ण लीलाओं का ही गान होने लगा। उन्हें अपनी भी सुध नहीं थी। वे श्रीकृष्ण को याद करने लगी। कृष्ण प्रकट हुए।
परात्पर ब्रह्म के रूप में उनकी अभिव्यक्ति ने कृष्ण के दिव्यप्रेम की जयगाथा लिख दी और कामदेव को उनके आगे समर्पण कर देना पड़ा।