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इसलिए बच्चों को चित्रों से पढ़ाया जाता हैः ओशो

Fri, 12 Jul 2013 12:20 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Fri, 12 Jul 2013 12:20 PM IST
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osho vani why education through picture

मनुष्य का जो मन है, वह पहले चित्रों की भाषा में सोचता है, फिर शब्दों की भाषा विकसित होती है। इसे आप यूं भी समझ सकते हैं कि जब आप सपने देखते हैं तो चित्रों की भाषा में देखते हैं, क्योंकि सपने में आप अपनी शिक्षा-दीक्षा सब भूल जाते हैं। जो भाषा आपको सिखाई गई प्रतीकों की, संकेतों की, गणित की, व्याकरण की, वह सब आप भूल जाते हैं। सपने में आप फिर प्राथमिक यानी अज्ञानी हो जाते हैं।

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सपने में फिर उन पुरानी अवस्थाओं में पहुंच जाते हैं, जहां हम चित्रों से सोच सकते हैं। दुनिया की जो प्राचीनतम भाषाएं हैं, वह चित्रों वाली हैं। चीन में अभी भी इसी भाषा का प्रयोग किया जाता है। इनके पास अभी भी वर्णाक्षर नहीं हैं। इसलिए इनकी भाषा बहुत कठिन है, हर चीज का चित्र, बहुत लंबी प्रक्रिया है। अगर चीनी भाषा को किसी को पढ़ना हो, तो कम से कम दस वर्ष तो लग ही जाएंगे और तब भी प्राथमिक ज्ञान ही होगा। कम से कम एक लाख शब्द-चित्र तो याद होने ही चाहिए वह भी साधारण ज्ञान के लिए।
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बच्चों का मन भी प्राचीनतम मन है। वह चित्रों से समझते हैं। इसलिए हमें कहना पड़ता है, ग गणेश का। ग से गणेश का कोई संबंध नहीं है, क्योंकि ग गधे का भी उतना ही है। लेकिन गणेश का या गधे का चित्र हम बनाएं, तो बच्चे को ग समझाना आसान हो जाता है। पुरानी किताबों में गणेश का चित्र होता था, नई किताबों में गधे का चित्र है, इसलिए मैं कह रहा हूं। क्योंकि सेक्युलर है गवर्नमेंट, धर्म-निरपेक्ष है राज्य।
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गणेश का चित्र नहीं बना सकते! पुरानी किताबों में ग गणेश का होता था, नई किताबों में ग गधे का है। ग को समझाना है तो गणेश को याद रखना पड़ता है। फिर जब बच्चा समझ लेगा, तो गणेश को छोड़ देगा, ग रह जाएगा। अगर बाद में भी आप पढ़ते वक्त हर बार कहें कि ग गणेश का, तो फिर पढ़ना मुश्किल हो जाएगा।

फिर गणेश को भूल जाना पड़ेगा और ग को याद रखना पड़ेगा। लेकिन ग को याद करने में पहले गणेश का उपयोग लिया जा सकता है, लिया जाता है। और अब तक कोई शिक्षा- पद्धति विकसित नहीं हो सकी, जिसमें हम बिना चित्रों का उपयोग किए बच्चों को शब्दों का बोध करा दें।

कृष्ण ने मौलिक बात कही थी कि कि मैं समस्त आत्माओं में आत्मा हूं। मैं समस्त आत्माओं का केंद्र हूं। मैं समस्त हृदयों का हृदय हूं। मेरा ही विस्तार है सब कुछ- आदि भी, मध्य भी, अंत भी मैं हूं। लेकिन वह बहुत गहरा भाव है और अर्जुन को भी पकड़ में नहीं आएगा। इसलिए कृष्ण अब चित्रों का प्रयोग करते हैं, और चित्रों के माध्यम से उस भाव की तरफ इशारा करते हैं। अर्जुन जो चित्र समझ सकेगा, निश्चित ही उनका ही उपयोग किया गया है।
साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली

ओशो जीवन परिचय
ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतानों में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये।


ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये।

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