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ओशो के इस मंत्र से जीवन में लाएं उन्नति का प्रकाश

Thu, 11 Sep 2014 03:25 PM IST
Updated Thu, 11 Sep 2014 03:25 PM IST
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osho vani on yoga and positivity

एक बार एक झेन गुरु ने अपने शिष्यों को प्रश्न के लिए आमंत्रित किया। एक शिष्य ने पूछा, ‘जो लोग अपनी शिक्षा के लिए परिश्रम करते हैं, वे भविष्य में मिलने वाले कौन-कौन से पुरस्कारों की आशा कर सकते हैं?’ गुरु ने उत्तर दिया, ‘वही प्रश्न पूछो जो स्वयं के केंद्र के निकट हो।’ दूसरा शिष्य जानना चाहता था, ‘मैं अपनी पहले की मूढ़ताओं को कैसे रोकूं, जो मुझे दोषी सिद्ध करती हैं?’

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गुरु ने फिर वही बात दोहरा दी, ‘वही प्रश्न पूछो जो स्वयं के केंद्र के निकट हो।’ तीसरे शिष्य ने पूछा, ‘गुरु जी, हम नहीं समझते कि स्व-केंद्र के निकट का प्रश्न पूछने का क्या मतलब होता है?’ ‘दूर देखने के पहले अपने निकट देखो। वर्तमान क्षण के प्रति सचेत रहो, क्योंकि वह अपने में भविष्य और अतीत के उत्तर लिए रहता है।
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अभी तुम्हारे मन में कौन सा विचार आया? अभी तुम मेरे सामने विश्रांत अवस्था में बैठे हो या तुम्हारा शरीर तनावपूर्ण ही है? अभी तुम्हारा पूरा ध्यान मेरी ओर है या थोड़ा बहुत ही है? इस तरह के प्रश्न पूछकर स्व-केंद्र के निकट आओ। निकट के प्रश्न ही दूर के उत्तरों तक ले जाते हैं।’
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यही है जीवन के प्रति योग का दृष्टिकोण। योग कोई तत्वमीमांसा नहीं है। वह दूर के, सुदूर के प्रश्नों की फिक्र नहीं करता-पिछला जन्म, आने वाला जन्म, स्वर्ग-नर्क, परमात्मा और इस तरह की बातों की योग फिक्र नहीं करता। योग का संबंध स्व-केंद्र के निकट के प्रश्नों से है। जितने निकट का प्रश्न होता है, उतनी ही अधिक संभावना उसे सुलझाने की होती है।

तब जीवन में प्रकाश ही प्रकाश होगा

osho vani on yoga and positivity

इसलिए अगर तुम पतंजलि से परमात्मा के संबंध में पूछो, तो वे उत्तर न देंगे। वस्तुतः तो वे तुम्हें मूढ़ ही समझेंगे। योग सारे तत्वमीमांसकों, सिद्धांतवादियों को मूढ़ मानता है; ये लोग उन समस्याओं पर अपना समय नष्ट कर रहे हैं जिन्हें सुलझाया नहीं जा सकता, क्योंकि वे बहुत दूर की हैं, व्यक्ति की पहुंच के बाहर की हैं। अच्छा हो वहीं से आरंभ करो जहां कि तुम हो। तुम वहीं से आरंभ कर सकते हो जहां तुम हो। यात्रा वहीं से आरंभ हो सकती है जहां तुम हो। दूर के बौद्धिक, तात्विक प्रश्न मत पूछो; भीतर के प्रश्न पूछो।

यह पहली बात हैं योग के विषय में समझ लेने की: योग एक विज्ञान है। योग एकदम यथार्थ और अनुभव पर आधारित है। यह विज्ञान की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरता है। असल में हम जिसे विज्ञान कहते हैं वह कुछ और बात है, क्योंकि विज्ञान केंद्रित होता है विषय-वस्तुओं पर। और योग का कहना है कि जब तक तुम उस तत्व को नहीं समझ लेते जो कि स्वभाव है, जो कि निकट से भी निकटतम है, तब तक तुम कैसे विषय-वस्तु को समझ सकते हो?

अगर व्यक्ति स्वयं को ही नहीं जानता, तो अन्य सभी बातें जिन्हें वह जानता हैं, भ्रांतिपूर्ण ही होंगी, क्योंकि आधार ही नहीं है। अगर भीतर ज्योति नहीं हो, अगर भीतर प्रकाष नहीं हो, तो तुम गलत भूमि पर खड़े हो, तो जो भी प्रकाश तुम बाहर लिए खड़े हो, वह तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकेगा। और अगर भीतर प्रकाश हो, तो फिर कहीं कोई भय नहीं है; बाहर कितना ही अंधकार हो, तुम्हारा प्रकाश तुम्हारे लिए पर्याप्त होगा। वह तुम्हारा मार्ग प्रकाशित करेगा।

साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली

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