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आइने में अपनी सूरत देखते हैं तो आइने का एक सच भी जान लीजिए

Thu, 24 Dec 2015 03:29 PM IST
Updated Thu, 24 Dec 2015 03:29 PM IST
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osho vani on life

एक पागल आदमी था। वह अपने को बहुत ही सुंदर समझता था। जैसा कि सभी पागल समझते हैं, वैसा वह समझता था कि पृथ्वी पर उस जैसा सुंदर और कोई भी नहीं है। यही पागलपन के लक्षण हैं। लेकिन वह आईने के सामने जाने से डरता था। और जब कभी कोई उसके सामने आईना ले आता तो तत्क्षण आईने को फोड़ देता था।

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लोग पूछते, क्यों? तो वह कहता कि मैं इतना सुंदर हूं और आईना कुछ ऐसी गड़बड़ करता है कि आईना मुझे कुरूप बना देता है! आईना मुझे कुरूप बनाने की कोशिश करता है! मैं किसी आईने को बरदाश्त नहीं करूंगा, मैं सब आईने तोड़ दूंगा! मैं सुंदर हूं, और आईने मुझे कुरूप करते हैं! वह कभी आईने में न देखता। लोग आईना ले आते तो तत्क्षण तोड़ देता!

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ओशो की नजर में यह है आइने का सच

osho vani on life

मनुष्य भी उस पागल की तरह व्यवहार करता रहा है। नहीं सोचता कि आईना वही दिखाता है? जो मेरी तस्वीर है। आईना वही बताता है? जो मैं हूं।

आईने को कोई प्रयोजन भी नहीं कि मुझे कुरूप करे। आईने को कोई मेरा पता भी नहीं। मैं जैसा हूं, आईना वैसा बता देता है। लेकिन बजाय यह देखने के कि मैं कुरूप हूं, आईने को तोड़ने में लग जाता हूं!

संसार को छोड़कर भाग जाने वाले लोग आईने को तोड़ने वाले लोग हैं। अगर संसार दुखद मालूम पड़ता है? तो स्मरण रखना कि संसार एक दर्पण से ज्यादा नहीं। वही दिखायी पड़ता है? जो हम हैं।

जीवन को नष्ट करते लोग

osho vani on life

वास्तव‌िकता यह है क‌ि जीवन सदा से अस्वीकृत रहा है! जीवन की श्रद्धा और सम्मान के लिए न तो कभी कोई पुकार दी है? न कभी कोई आह्वान किया गया है। जीवन को छोड़ देने, जीवन से पलायन करने, जीवन को तोड़ देने और नष्ट कर देने की बहुत-बहुत चेष्टाएं जरूर की गयी हैं।

या तो वे लोग पृथ्वी पर प्रभावी रहे हैं, जिन्होंने दूसरों के जीवन को नष्ट करने की कोशिश की --राजनीतिज्ञ, सेनापति, युद्धखोर। या वे लोग जो दूसरों का जीवन नष्ट करने में नहीं लगे हैं, तो वे दूसरी प्रक्रिया में लग गये हैं, वे अपने ही जीवन को नष्ट करने का प्रयास करते रहे हैं--तथाकथित धार्मिक, तथाकथित साधु-संन्यासी।

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जीवन से भिन्न कोई मोक्ष नहीं है

osho vani on life

दो प्रकार की हिंसा चलती रही है। या तो दूसरे का जीवन नष्ट करो या अपना जीवन नष्ट करो। या तो दूसरों को समाप्त करो या स्वयं को समाप्त करो। जीवन की दोनों ही अर्थों में हत्या होती रही है।

जीवन का परिपूर्ण सम्मान आज तक भी मनुष्य के मन में प्रतिष्ठित नहीं हो पाया। स्वभावतः जब मैं कहूं कि जीवन ही देवता है? जीवन ही प्रभु है तो अनेक प्रश्न उठ आने स्वाभाविक हैं। जीवन जंजीर नहीं है और जीवन से भिन्न कोई मोक्ष नहीं है।

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