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अगर आप भी कभी उपवास रखते हैं तो यह बात याद रखें

Wed, 14 Oct 2015 01:17 PM IST
Updated Wed, 14 Oct 2015 01:17 PM IST
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osho pravachna on fasting

उपवास का मतलब यह समझा जाता है कि भोजन का त्याग कर दिया तो उपवास है लेकिन ओशो का मत इससे अलग है। ओशो कहते हैं कि, बिना भोजन के उपवास नहीं हो सकता।

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दूसरी बात यह भी है कि बिना उपवास के भोजन नहीं हो सकता। इसलिए हर दो भोजन के बीच में आठ घंटे का उपवास करना पड़ता है। वह जो आठ घंटे का उपवास है, वह फिर भोजन की तैयारी पैदा कर देता है।
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इसलिए अगर तुम दिनभर खाते रहोगे, तो भूख भी मर जाएगी, भोजन का मजा भी चला जाएगा। भोजन का मजा भूख में है। यह तो बड़ी उलटी बात हुई! भोजन का मजा भूख में है। जितनी प्रगाढ़ भूख लगती है, उतना ही भोजन का रस आता है।

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ब्रह्मचर्य की जड़ें कामवासना में हैं

osho pravachna on fasting

इसका तो यह अर्थ हुआ कि ध्यान का रस विचार में है। तुमने जितना विचार कर लिया होता, उतनी ही ध्यान की आकांक्षा पैदा होती। इसका तो अर्थ हुआ कि ब्रह्मचर्य की जड़ें कामवासना में हैं; कि तुमने जितना काम भोग लिया होता, उतने ब्रह्मचर्य के फूल तुम्हारे जीवन में खिलते।

ये मेरी बातें तुम्हें उलटी लगेंगी; क्योंकि जिन्होंने तुम्हें समझाया है अब तक, उन्होंने खंड करके समझाया है। उन्होंने कहा, कामवासना ब्रह्मचर्य के विपरीत है। उन्होंने कहा, संसार संन्यास के विपरीत है। उन्होंने हर चीज के बीच द्वंद्व और संघर्ष और कलह पैदा कर दी है। ये जो कलह पैदा करने वाले लोग हैं, इनको तुम गुरु समझ रहे हो। यही तुम्हें भटकाए हैं।

शरीर और आत्मा मिले

osho pravachna on fasting

मैं चाहता हूं कि तुम्हारे जीवन में अकलह हो जाए, एक संवाद छिड़ जाए, संगीत बजने लगे। अलग-अलग स्वर न रह जाएं, सब एक संगीत में समवेत हो जाएं।

तुम्हारे भीतर एक कोरस का जन्म हो, जिसमें सभी जीवन की तरंगें संयुक्त हों, बाहर और भीतर मिले, शरीर और आत्मा मिले, परमात्मा और प्रकृति मिले।

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