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आखिर क्यों नए विचारों और धर्म का विरोध होता रहा है?

Thu, 30 Jan 2014 11:26 AM IST
अध्यात्मिक गुरु / ओशो
अध्यात्मिक गुरु / ओशो Updated Thu, 30 Jan 2014 11:26 AM IST
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osho pravachan on dharm

भाषा के सामान्य अर्थ में वे न तो धार्मिक हैं और न धर्म हैं। वे उनसे कहीं अधिक हैं...वे कहीं अधिक गहन और कहीं अधिक उच्च हैं। तथाकथित समाज के पास अपनी कोई दृष्टि नहीं है, वह तो अंधे लोगों से ही बना है। ऐसा हमेशा से होता आया है।

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जब बुद्ध प्रकट हुए तो उन लोगों ने विश्वास ही नहीं किया कि उनकी शिक्षाएं धार्मिक थीं। जब जीसस आए तो उन्होंने उन्हें क्रॉस पर चढ़ा दिया। जब मंसूर ने घोषणा की--‘‘मैं परमात्मा हूं’’, तो उन्होंने उसे मार डाला।
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मुसलमान सोचते हैं कि मंसूर सबसे अधिक अधार्मिक लोगों में से हैं, जो कभी भी इस पृथ्वी पर हुए, उनमें से एक था, जिसने स्वयं परमात्मा होने की घोषणा की। यह तो कुफ्र है; यह धर्म के विरुद्ध और घोर अधार्मिक कृत्य है।
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जब कभी भी ऐसा होता है कि शुद्ध और नग्न सत्य को काव्यात्मक भाषा में अभिव्यक्त किया जाता है, तो समाज उसके बारे में बेचैनी का अनुभव करने लगता है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि धर्म के पास एक तरह का नकली धर्म है, जो सुविधाजनक, आरामदायक और सांत्वना देने वाला है।

उसके पास पूजा करने के लिए नकली पूजाघर और पूजने के लिए नकली देवी-देवता और उनका अनुसरण कराने के लिए नकली पुजारी और धर्माचार्य हैं। और यह सभी कुछ बहुत सुविधामय है, क्योंकि वे तुम्हारे जीवन में कोई बाधा या व्यवधान उत्पन्न नहीं करते।

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तुम एक ईसाई बने रह सकते हो। वास्तव में यह तुम्हारे जीवन में अशांति या उपद्रव खड़े नहीं करते- बल्कि इसके विपरीत, यह तुम्हारे जीवन में सहायक होते हैं। तथाकथित समाज, तथाकथित समाज के नियम और नैतिकता, यदि तुम एक ईसाई हो, तो तुम उन्हें अपने अनुरुप बनाकर ठीक से उनका समायोजन कर लेते हो। लेकिन क्राइस्ट का अनुसरण करना बहुत खतरनाक है।

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किसी भी ईसाई ने कभी भी आज तक क्राइस्ट का अनुसरण नहीं किया है और वह कर भी नहीं सकता। वास्तव में, ईसाई बनना एक तरह से क्राइस्ट से बच कर दूर रहने का ढंग है। एक बौद्ध बनकर रहना, बुद्ध से बचने का एक ढंग है।

यदि तुम वास्तव में बुद्ध से प्रेम करते हो, तब तुम बौद्ध न बनकर एक बुद्ध बनना चाहोगे। कोई भी व्यक्ति एक ईसाई क्यों बनना चाहता है? या तो क्राइस्ट बनो अथवा इसके बारे में सभी कुछ भूल जाओ।

लेकिन क्राइस्ट बनना खतरनाक है। उन्हें अनैतिक और बुरे लोगों द्वारा क्रूस पर नहीं चढ़वाया गया, उन्हें अच्छे और प्रतिष्ठित लोगों के द्वारा ही मारा गया। यह बात सदा स्मरण रहे।

बुद्ध पर अपराधियों द्वारा आक्रमण नहीं किया गया। उन पर ऐसे लोगों के द्वारा आक्रमण किया गया, जिनके अपराधी होने के बारे में तुम कभी सोच भी नहीं सकते--वे सभी लोग अच्छे, नैतिक और कट्टर धार्मिक व्यक्ति थे।

ऐसा क्यों होता है? जीसस को यहूदी धर्म के रब्बियों, विद्वानों और धार्मिक व्यक्तियों, जो हर तरह से अच्छे लोग थे, के द्वारा ही मार डाला गया। उनके जीवन पूरी तरह साफ-सुथरे थे और वे चरित्रवान थे। और उन्हें उन लोगों का भी प्रेम मिला, जिनके पास कोई चरित्र था ही नहीं-जैसे वेश्या मेग्दलीना।

केवल कुछ ही दिनों पूर्व स्विट्जरलैंड से एक युवती आई, उसका नाम मेग्दलीना था। उसने संन्यास लिया, पर मैंने उसका नाम नहीं बदला। मैं इस नाम से प्रेम करता हूं--मेग्दलीना। एक वेश्या ने तो जीसस का अनुसरण किया और यहूदी पुजारियों अर्थात् रब्बी लोगों ने उन्हें मार डाला।

चोरों, शराबियों और जुआरियों ने तो जीसस का अनुसरण किया और रब्बियों ने उन्हें मार डाला। सभी तथाकथित संत उनके विरुद्ध थे और तथाकथित पापी उनके पक्ष में थे-यह किस तरह का संसार है? यह कैसा विरोधाभास है? ऐसा हमेशा क्यों होता है? इस बारे में इसका एक विशिष्ट कारण है।

पृथ्वी पर जब भी कोई नया धर्म, और एक नई व्यवस्था आती है, जब कभी भी परमात्मा की एक नई झलक का प्रकाश पृथ्वी पर फैलता है, जब कभी परमात्मा की ओर कोई नया द्वार अथवा खिड़की खुलती है, वह पहले उन लोगों के द्वारा स्वीकार की जाती है, जो लोग बहुत प्रतिष्ठित नहीं हैं। आखिर क्यों?

क्योंकि जिन लोगों के पास खोने को कुछ भी नहीं होता, वे लोग स्वीकार कर सकते हैं। क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, इसलिए वे स्वीकार कर सकते हैं। वे सत्य को भी स्वीकार कर सकते थे, क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था। मेग्दलीना के पास खोने के लिए क्या था?

लेकिन प्रधान रब्बी के पास खोने के लिए बहुत कुछ था। पुराने सड़े-गले धर्म में, जो एक लम्बी अवधि से मृत हो चुका था, जो दुर्गंध देते हुए ठीक एक मुर्दे जैसा हो गया था, उसमें उसकी सारी पूंजी लगी हुई थी। वह प्रधान-पुजारी था। यदि वह जीसस का अनुसरण भी करता, फिर भी वह प्रधान-पुजारी न रह पाता, और प्रधान पुजारी के पद पर रहते हुए उसके सभी विशेषाधिकार भी समाप्त हो जाते।

उसके पास सर्वाधिक सुंदर भवन था। और उसे श्रेष्ठतम तथा सबसे अधिक वेतन मिलता था। वह सर्वाधिक प्रतिष्ठित व्यक्ति था-फिर उसे क्यों इस आवारा जीसस का अनुसरण करना चाहिए था? यह उसके लिए पूरी तरह से घाटे का सौदा था।
मेग्दलीना, जीसस का अनुसरण कर सकी, क्योंकि उसके पास खोने को कुछ भी नहीं, और पाने के लिए बहुत कुछ था। एक जुआरी और शराबी के पास भी खोने को कुछ भी नहीं बल्कि कुछ पाने को ही होता है।


सभी महान धर्म विद्रोही लोगों के द्वारा ही शुरू किए जाते हैं। सभी महान धर्मों की शुरुआत युवाओं द्वारा ही की जाती है। क्योंकि बूढ़े लोगों की पुराने धर्म में बहुत अधिक पूंजी लगी होती है। अपने पूरे जीवन भर वे पूजा और प्रार्थनाएं करते रहे हैं, अब अचानक वे उसे बंद नहीं कर सकते।

यदि वे उसे बंद करते हैं, तो इसका अर्थ है कि उनका पूरा जीवन ही गलत रहा है। उसे स्वीकार करना उनके स्वभाव के विरुद्ध और उनके अहंकार के विरुद्ध होता है। इसलिए केवल बहुत थोड़े से अति साहसी वृद्ध लोग ही एक जीसस अथवा एक बुद्ध का अनुसरण कर सके।

जो लोग इतने अधिक साहसी थे, केवल वे लोग उस महत्पवूर्ण चीज को देख और समझ कर यह कह सके ‘‘ठीक है, चूंकि पुराना धर्म गलत था इसलिए मैं उसे छोड़ता हूं। मेरा पूरा जीवन गलत था और अब मैं नए सिरे से फिर शुरुआत करता हूं।’’

वृद्धावस्था में नए सिरे से शुरुआत करना बहुत कठिन होता है, क्योंकि वहां सामने केवल मृत्यु खड़ी दिखाई देती है, अब समय नहीं बचा और अब तुम कुछ नई चीज का प्रारंभ कर रहे हो। इसके लिए महान आस्था की, जीवन में और परमात्मा में गहन श्रद्धा और साहसिकता की आवश्यकता होती है।

ओशो
पुस्तक: सहज जीवन, भाग-1
प्रवचन नं. 8

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