Motivational tips for exam : परीक्षा की तैयारी से पहले जानें कैसे लगेगा पढ़ाई में मन
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हमारी कोशिश ये रहती है कि हम जैसी ज़िन्दगी जी रहे हैं, जीते रहें। पर उसके बाद भी जो हम नियंत्रित करना चाहते हैं, वो हम कर लें।
चील स्वयं से कहे कि आज से मुझे घास खानी है और वो बहुत ज़ोर से बोले कि आज से जो मेरी मांस खाने की प्रवृत्ति है, उसका मैं त्याग करती हूं; माँस पर नियंत्रण और घास चालू। ऐसे में क्या उसे कभी भी सफ़लता मिलेगी? नहीं! वो जब तक ‘चील’ है, तब तक उसे मांस ही आकर्षित करेगा।
आखिर किन चीजों को छोड़ना होगा
इसी बात को अपने सन्दर्भ में समझो। तुम जब तक ‘तुम’ हो, तुम्हें वही सब कुछ आकर्षित करेगा, जो करते आए हो और तुम जब तक ‘तुम’ हो, तुम्हें वो सब नहीं आकर्षित करेगा, जो आज नहीं करते हो। तुम चाहते हो कि तुम तो वैसे ही बने रहो जैसे तुम हो, तुम्हारी पूरी पहचान, तुम्हारा पूरा अहंकार, तुम्हारे मन की जो पूरी व्यवस्था है, वैसी ही बनी रहे जैसी हैं; क्योंकि उसमें तुम्हें सुविधा है। पर साथ ही साथ, तुम्हें एकाग्रता भी उपलब्ध हो जाए, तुम्हें नियंत्रण भी उपलब्ध हो जाए। ये हो नहीं पायेगा! तुम असम्भव की मांग कर रहे हो।
ऐसे में नहीं लगेगा मन
तुम्हारा हिसाब बिलकुल चील वाला है। तुम दिनभर अभ्यास करते हो, तुम दिनभर अपनी ही उल्टी-पुल्टी ट्रेनिंग करते हो और शाम को तुम घर जाते हो और किताब खोलकर बैठते हो, और पाते हो कि पढ़ नहीं पा रहे, किताब में मन नहीं लग रहा। नहीं लग सकता। असंभव है।
दोनों हाथ मे लड्डू नहीं चलेगा
जब दिनभर तुमने अपने मन को दूषण से भरा है। जब दिनभर तुमने उसको मौका दिया है, इधर-उधर आकर्षित होने का, तो शाम को भी वो उधर को ही आकर्षित होगा। पर तुम चाहते क्या हो? तुम चाहते हो, दिन भर तो तुम वही करो जो तुम करते रहे हो और शाम को जब पढ़ने बैठो तो तुम वहां भी टॉपर हो जाओ। तुम चाहते हो, दोनों हाथ में लड्डू रहे। ये तुम नहीं पाओगे। तुम्हें पूरा जीवन बदलना होगा और जीवन बदलने के लिए तुम तैयार नहीं होओगे।
एकाग्रता की कमी
ये जो पूरा मुद्दा है ध्यान का, एकाग्रता का, वो फ़ालतू है। क्योंकि तुम जो हो, उसी के मुताबिक तो ध्यान लगाओगे ना! जब तुमने पूरा अभ्यास ही अपने आप को विकृत करने का कर रखा है, तो तुम्हारा ध्यान भी उसी मुताबिक उस दिशा में जाता है। वैज्ञानिक भी अपना ध्यान केंद्रित करता है, अपनी प्रयोगशाला में और तुम भी ध्यान केंद्रित करते हो, पूरे तरीके से, पर अपने मुताबिक कुछ चुने हुए विषयों पर। कोई क्रिकेट मैच पर ध्यान केंद्रित कर लेगा, किसी को अगर कोई ख़ास तरीके का खाना दिखाई दे जाए, तो उस पर ध्यान केंद्रित हो जाएगा। अगर लड़के हो और लड़कियां दिख जाएं तो पूरा ध्यान वहीं केंद्रित हो जाएगा।
तो यह सवाल ही गलत होगा कि हम ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते! पूछना ये ज़रूरी है कि हम किस वस्तु पर ध्यान केंद्रित करते हैं। और ये बात याद रहे कि तुम उसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करोगे, जिसका तुमने निरंतर अभ्यास किया है, वही तुम्हारी आदत, तुम्हारी ज़िन्दगी बन गयी है।
हर पल होती है परीक्षा
जीवन में परीक्षा सेमेस्टर में एक बार या तीन बार नहीं होती। हर पल होती है। वो पल अगर तुमने पा लिया, तो उसी पल परिणाम घोषित हो गया कि कौन अच्छा! और जिन्होंने नहीं पाया वो फेल हो गए। वो पल गया, अब नहीं लौटेगा। दूसरा कोई मौका नहीं मिलेगा, उस पल को दोबारा जीने का। जीवन सदैव नया है, पूरा है, कुछ भी इसमें दोहराया नहीं जाता, रिवाइंडिंग के लिए कोई स्थान नहीं है।
‘परिणाम’ भविष्य में नहीं है, ‘परिणाम’ ‘अभी’ में है। ठीक अभी परिणाम घोषित होता जाता है। बड़ी सुचारु मशीनरी है समय की। वो इतना समय नहीं लेती कि आज परीक्षा दो, फिर पर्चों का मूल्यांकन होगा, फिर परिणाम घोषित होगा।
कैसे करें पढ़ाई
जो प्रेम से पढ़ेगा, जो किताब के साथ खो जाएगा, डूब जायेगा, क्या उसे चिंता करनी पड़ेगी कि परिणाम कैसा आएगा? पर तुमने वो कभी जाना नहीं। तुम किताब के पास जाते ही तब हो, जब तुम्हें डर लगने लगता है कि अरे, परसेंटेज काम हो जायेगा या डेट-शीट लग गयी, तो पढ़ने का समय आ गया। तुम किताब के पास कभी इसलिए जाते ही नहीं कि किताब में ऐसा कुछ है जो कीमती है। वो तुमने कभी सीखा ही नहीं।
किताब के सही मायने
तुम्हारे लिए किताब का अर्थ ही सिर्फ ‘अंक’ है। अंकों के अलावा तुम्हारी किताब का कोई अर्थ नहीं। और मज़े की बात ये है कि जो किताब के पास अंक के लिए जाता है, सिर्फ अंक के लिए; उसे मार्क्स भी नहीं मिलते। और जो किताब के पास इस कारण जाता है कि किताब अपने आप में मूल्यवान है, उसे बिना मांगे अंक मिल जाते हैं। सरप्राइज़ गिफ्ट की तरह। उसने माँगा नहीं, मिल गए। ऐसे ही मिलता है!
जो अंकों के लिए पढ़ेगा, वो डरा हुआ होगा। और ये डरा हुआ मन कुछ समझ नहीं पाता। उसे कुछ समझ में नहीं आता।
चिंता छोड़ो और पूरी तरह से जियो
परिणाम की चिंता छोड़ो। पूरी तरह से जियो, पूरे दिन को, सुबह से ले कर शाम तक। जीवन जैसा भी है, उसमें पूरी तरह से उपस्थित रहो। बेहोश से मत रहो, कि सब चल दिए तो हम भी चल दिए। सब बैठ गए तो हम भी बैठ गए। सब इंजीनियरिंग कर रहे हैं, तो हम भी कर रहे हैं। सब मास बंक कर रहे हैं, तो हम ने भी कर दिया। ऐसी तिरछी आड़ी चाल मत चलो और पाओगे कि जीवन की हर परीक्षा में अव्वल आ रहे हो!