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अपने जीवन में स्वाभाविकता बनाए रखें: श्री श्री रविशंकर
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
Updated Tue, 15 Jan 2013 02:13 PM IST
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स्वाभाविक रहने का अर्थ है कि, स्वयं को, दूसरों को और आपके आस-पास की सभी वस्तुओं को वे जैसे हैं वैसा ही स्वीकार किया जाना। आपने उसे बोझ के जैसे नहीं परन्तु समझ के साथ स्वीकार किया है कि, वह ऐसा है। जब आप यह सोचते हैं या महसूस करते हैं कि, यह ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए, तो फिर आप अपने सही स्वभाव में नहीं रहते, फिर आप अपनी सीमाओं के सम्पर्क में आ जाते हैं। वह सीमा है, स्वाभाविक और सुखी नहीं रहने की सीमा।
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गलतियों का ज्ञान आपको तब मिलता है जब आप मासूम होते हैं। जो भी गलती हो जाये उसके लिए आप अपने आप को पापी न समझें क्योंकि उस वर्तमान क्षण में आप फिर से नवीन, शुद्ध और स्पष्ट हो जाते हैं। भूतकाल की गलतियां भूतकाल हैं। जब यह ज्ञान मिल जाता है तो आप फिर से परिपूर्ण हो जाते हैं। कई बार मां अपने बच्चों पर नाज करती हैं और उसके उपरांत अपने आप को दोषी समझती है। क्रोध सजगता की कमी के कारण आता है। स्वयं, सत्य और कौशल का ज्ञान आप में उत्तमता को उभार देता है। इसलिए गलती करने से न डरें परन्तु वही गलती दोबारा न करें। आपको अपनी गलतियों में नवीनता रखनी चाहिए।
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कई बार आप अपनी गलतियों को सुधारना चाहते हैं। आप उसे कितना सुधार पाते हैं? जब आप दूसरों की गलतियां सुधारते हैं तो दो स्थिति होती है। पहली जब आप किसी की गलती सुधारते हो क्योंकि वह आपकी परेशानी का कारण होती है। दूसरी जब आप किसी की गलती सुधारते हो तो वह सिर्फ उनके लिए होता है इसलिए नहीं कि वह आपको परेशान करती है परन्तु इसलिए ताकि उनका विकास हो सके।
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गलतियों को सुधारने के लिए आपको अधिकार और प्रेम की आवश्यकता होती है। अधिकार और प्रेम एक दूसरे के विरोधाभासी हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। अधिकार के बिना प्रेम घुटन जैसा है। प्रेम के बिना अधिकार उथला है। एक मित्र के पास अधिकार और प्रेम दोनों होना चाहिए परन्तु वह सही मेल में होना चाहिए। यह सिर्फ तब हो सकता है जब आप पूर्णतः आवेगहीन और केन्द्रित होंगे।
जब आप गलतियों के लिए जगह देंगे तो आप दोनों अधिकारपूर्ण और एक दूजे के प्यारे हो जाएंगे। दैवीय गुण इसी तरह के होते हैं। दोनों का सही संतुलन। कृष्ण और ईसा मसीह में दोनों थे। दूसरों की तरफ उंगली उठाकर गलतियां मत करो। किसी व्यक्ति को उस गलती के बारे में मत बताओ जो उसे पता है, उसने की है। ऐसा करके आप उसे और अधिक अपराधी बना देंगे। एक महान व्यक्ति दूसरों की गलतियों को नहीं पकड़ता है और उन्हें अपराधी महसूस होने नहीं होने देता है, वह उन्हें आवेग और देखरेख के साथ ठीक करता है।
जब आप दया दिखाते हैं तब आपका वास्तविक स्वभाव सामने आता है। क्या आपने कभी किसी की सहायता की है? किसी से बिना कुछ अपेक्षा किये हुए? हमारी सेवा बुद्धिहीन नहीं होनी चाहिए। आपको सहायता करने के लिए योजना नहीं बनानी चाहिए। जब आप बिना किसी सोच विचार के स्वतः ही सहायता करते हैं तब आप अपने वास्तविक स्वभाव में आ जाते हैं। अनायास में कुछ करे और स्वाभाविक रहें।
स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर: परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।