सीख: विपरीत परिस्थितियों में ही हमें अपने जीवन की महत्ता का एहसास होता है
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मैं ऑफिस से दस बजे निकली थी। मैं मेट्रो में चढ़ गई। राजीव चौक पर बैठने की जगह मिल गई थी। मेरे सामने वाली सीट पर एक आठ साल की प्यारी-सी लड़की अपनी मम्मी के साथ बैठी थी। वह प्यारी बच्ची थी। उसने जोर से हाथ हिलाकर मुझे हाय किया। मैंने भी मुस्करा कर हाय बोल दिया। मेट्रो में भीड़ थोड़ी बढ़ने लगी थी। वह लोगों के पीछे छुप गई थी। मैं याद कर रही थी कि मेरी दीदी की लड़की भी लगभग इतनी ही बड़ी होगी। उसे देखे हुए पांच साल बीत गए थे। तभी वह लड़की मेरे पास आकर बैठ गई और मुस्कराने लगी। मैं सोचने लगी, ऐसे कैसे कोई किसी भी अनजान व्यक्ति के पास आकर बैठ सकता है।
क्या इसकी मम्मी को इसकी कोई फिक्र नहीं? फिर मेरे मन में अजीब-अजीब से ख्याल आने लगे। कहीं यह कोई साजिश तो नहीं। फिर मैं थोड़ा सतर्क हो गई। मैं यह सब सोच ही रही थी कि तभी मेट्रो एक टनल में घुस गई। मेट्रो के अंदर भी थोड़ा अंधेरा-सा हो गया। इतने में वह लड़की मुझे थोड़ा झुकने का इशारा करने लगी। मुझे लगा, शायद कान में कुछ कहना चाहती होगी। लेकिन फिर जो हुआ, वह मैं भुला नहीं सकती। जैसे ही मैं झुकी, उसने मेरे गाल पर एक प्यारी-सी पप्पी दे दी, और तुरंत उठकर अपनी मम्मी के पास चली गई।
मैं हैरान थी। तभी उसकी मम्मी और वह मेरे पास वाले दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं। उनका स्टेशन आने वाला था। उसकी मम्मी बोलीं, माफ कीजिएगा, असल में इसके दिल में एक छेद था, पिछले तीन वर्षों से इसका इलाज चल रहा था। यह रोज यही सुनती थी कि इसके पास दिन बहुत कम हैं। आज ही डॉक्टर ने इसे बताया है कि यह अब बिल्कुल ठीक है। मैं सोचने लगी, दूसरों से बांट पाना तो दूर, हममें से कितने लोग इस बात को महसूस कर पाते हैं कि हम जीवित हैं, या अपनी जिंदगी जी सकते हैं।