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सीख: अमृत के लिए एक मंथन भीतर भी
Mon, 21 Oct 2019 08:33 AM IST
विनोद शुक्ला
राजेंद्र ऋषि
राजेंद्र ऋषि
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 21 Oct 2019 08:33 AM IST
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समुद्र मंथन
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समुद्र मंथन जरूरी क्यों
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धरती बनाने के लिए समुद्र मंथन जरूरी था, क्योंकि उस वक्त धरती का छोटा सा हिस्सा ही जल से बाहर था,बाकी हर जगह पानी ही पानी था। इसके लिए केवल देवता ही काफी नहीं थे। देवताओं के साथ राक्षसों की शक्ति का भी प्रयोग होना था। राक्षस राजी हो गए, क्योंकि समुद्र मंथन से जो अमृत मिलता, वह उन्हें अमर कर देता। त्रिदेव ने लीला रची और इंद्र से ऋषि दुर्वासा का अपमान हो गया। इंद्र को अपने सिंहासन से हाथ धोना पड़ा, तब वह विष्णु की शरण में गए और उनकी सलाह पर वह सागर का मंथन करने के लिए तैयार हुए।
मंथन से निकलने वाले अमृत को देवताओं को पिलाना था। मंदार पर्वत और वासुकि नाग की सहायता से समुद्र मंथन की तैयारी शुरू हुई। विष्णु ने कछुए का रूप लेकर मथनी बन मंदार पर्वत अपनी पीठ पर रखा और उसे समुद्र में नहीं डूबने दिया। सबसे पहले विष निकला जिसे देवताओं और राक्षसों दोनों ने लेने से मना कर दिया। इससे सृष्टि नष्ट हो सकती थी, इसलिए शिव जी ने इस विष का पान किया, लेकिन पार्वती के प्रयत्नों से विष शिव के गले में ही अटक गया और उनका गला नीला हो गया, इसलिए शिव नीलकंठ कहलाए।
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समुद्र मंथन के वक्त कई और चीजें भी निकलीं जैसे कामधेनु गाय, उच्चैश्रवा नामक सफेद घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, धन की देवी, देवों के चिकित्सक धनवंतरि आदि। अंत में अमृत के लिए सभी इंतजार कर रहे थे। असुरों के हाथ न लगे, इसलिए विष्णु ने मोहिनी बन कर असुरों का ध्यान अमृत से हटाया और देवताओं को अमृत-पान कराया।
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समुद्र मंथन में छिपे जीवन उपदेश और इस पौराणिक कथा का आध्यात्मिक संबंध है। आध्यात्मिक रूप से देखा जाए तो समुद्र का अर्थ है शरीर, और मंथन से अमृत और विष दोनों निकलते हैं। इस कहानी के किरदार हमारे जीवन से मेल खाते हैं जैसे देवता सकारात्मक सोच और समझ को दर्शाते हैं वहीं असुर नकारात्मक सोच एवं बुराइयों के प्रतीक हैं।
समुद्र
समुद्र हमारे दिमाग के समान दिखाया गया है, जिसमें कई तरह के विचारों एवं इच्छाओं की उत्पत्ति होती है और समुद्र की लहरों के समान यह भी समय-समय पर बदल जाती हैं।
मंदार पर्वत
मंदार, अर्थात मन और धार, पर्वत आपकी एकाग्रता को दर्शाता है, क्योंकि यह एक ही दिशा में सोचने की बात कहता है।
कछुआ
कथा में कछुए यानी विष्णु जी ने अहंकार को हटा कर समुद्र मंथन का सारा भार अपनी पीठ पर लिया। ऐसे ही हमें भी अहंकार को हटा कर सबके हित में अथवा एकाग्रता की राह पर चलना चाहिए।
विष और मोहिनी
विष या हलाहल जीवन से जुड़े दुःख और परेशानियों का प्रतीक है। विष को पीने वाले महादेव बाधाओं को दूर करना सिखाते हैं। मोहिनी यानी ध्यान का भटकना,जो हमें हमारे लक्ष्य से दूर करता है।
अमृत
अमृत हमारे लक्ष्य यानी जीवन के सार को दर्शाता है। मंथन के दौरान पाई जाने वाली वस्तुएं सिद्धियों की प्रतीक हैं। यह सिद्धियां भौतिक दुःख दूर करने के बाद प्राप्त होती हैं।
समुद्र मंथन का प्रतीक दर्शन यही है कि परिस्थतियां कितनी भी बुरी क्यों न हों कभी भी निराश नहीं होना चाहिए। कोई न कोई मार्ग अवश्य निकल आता है और स्थिति पहले जैसी हो जाती है।