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कबीर दास ने कहा है ऐसे लोग ही पढ़ने लिखने के बाद भी बेकार रह जाते हैं

Wed, 27 Jul 2016 10:51 AM IST
निर्मल भजनीक
निर्मल भजनीक Updated Wed, 27 Jul 2016 10:51 AM IST
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kabir vani on knowledge
कबीर दास

ज्ञान प्राप्ति के लिए उत्सुक एक भक्त कई दिनों से आग्रह कर रहा था। कबीर रोज उसे टाल देते। आखिर एक दिन उन्होंने कहा- वत्स, पैर के नीचे की शिला को उठा। शिष्य ने तुरंत शिला उठाई। शिला के नीचे एक सुरंग थी। दोनों भीतर घुसे। भीतर एक दरवाजे पर लिखा था- अपने कान काटने वाला इस दरवाजे को खोल सकेगा। कबीर ने अपने दोनों कान काट डाले। वह दरवाजा खुला और कबीर अंदर गए। दरवाजा फिर बंद हो गया।

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भक्‍त ने खोलने का प्रयत्न किया, तो अंदर से कबीर की आवाज आई कि मैंने जैसा किया, वैसा करने पर ही द्वार खुलेगा। भक्त भी कान काटकर अंदर पहुंचा। दूसरे दरवाजे पर इसी प्रकार लिखा था। कबीर नाक काटकर अंदर घुस गए। भक्त ने भी उनका अनुसरण किया और अंदर दाखिल हुआ। तीसरे पर लिखा था- जिसे अंदर आना हो, वह पहले अपना सिर काटे। कबीर तो सिर उड़ाकर अंदर चले गए, पर भक्त बाहर ही रहा। नाक, कान, और सिर कट जाने के बाद ज्ञान का क्या उपयोग?
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वह इसी विचार से डूबा हुआ था कि उसे नींद आ गई। जब नींद खुली, तो वहां दूर से कबीर आते दिखाई दिए। कबीर ने पूछा, क्या मेरी राह देख रहे हो? भक्त ने पूछा, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा गुरुदेव। क्या मेरे नाक-कान अब सदा के लिए गए? कबीर ने कहा, इसमें क्या संदेह है? हमेशा के लिए ही गए।
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शिष्य घबराते हुए बोला, पर भगवन! आपके नाक, कान तो पहले की तरह हो गए हैं। मेरे भी पहले की तरह ही कर दीजिए न। कबीर ने कहा, यह कैसे हो सकता है? सिर काटा होता, तो सब अंग मेरी तरह पूर्ववत हो जाते। आधे-अधूरे काम कहीं सफल होते हैं क्या? इसल‌िए जो श‌िक्षा ग्रहण करो उसे पूरा करो अधे-अधूरे ज्ञान वाले व्यक्त‌ि असफल रह जाते हैं।

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