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सीख: रुचि को हमेशा करना चाहिए प्रोत्साहित, पढ़ें पिता-पुत्र की रोचक कहानी
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
Updated Thu, 23 Aug 2018 03:49 PM IST
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किशन की कथा, जिससे प्रभावित होकर बृजमोहन ने अपने बेटे को रुचि के काम करने को प्रोत्साहित किया।
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बृजमोहन घर पहुंचे, तो उनकी आंखों में नमी थी। बेटे ने इसकी वजह पूछी, तो वह बोले, मुझे माफ कर दो बेटा। मैंने तुम्हारे साथ बहुत ज्यादती की है। मैंने तुम्हारी जिंदगी के तीन साल बर्बाद करवाए हैं। तुम्हें शुरू से फोटोग्राफर बनने का शौक था। मेरी वजह से तुमने बायोलॉजी ली, और अब तीन साल से मेडिकल की परीक्षाओं में लगे हो। अगर मैंने तुम्हे फोटोग्राफी करने दी होती, तो आज तुम्हारा काम अच्छा निकल पड़ता। बेटा कुछ समझ नहीं पा रहा था।
तब तक पीछे से उसकी मां ने अंदर घुसते हुए कहा, मोनू, आज तुम्हारे पिता जी के पुराने दोस्त से मुलाकात हुई। वह एक जिम ट्रेनर हैं, पर क्या आलीशान बंगला और गाड़ी है उनके पास। बृजमोहन अपने बेटे से बोले, आज उसने मेरी सोच बदल दी। बेटे और पत्नी ने पूछा, वह कैसे? बृजमोहन बोले, जब हम छोटे थे, तभी से किशन खेल-कूद में हमेशा आगे रहता था। लेकिन उसके पिता उसे इंजीनियर बनाना चाहते थे। वह जब नौवीं में पहुंचा, तो उसके पिता ने उसका स्पोर्ट्स पूरी तरह छुड़वा दिया। तब हम सबको वह ठीक लगा था। बारहवीं के बाद उसके पिता ने पढ़ाई के लिए उसे घर में बंद कर दिया था।
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आज उसने बताया कि पांच साल कोशिश करने के बावजूद वह इंजीनियरिंग की परीक्षा पास नहीं कर सका, तो पिता ने उसे घर से निकाल दिया। उस वक्त उसने सिर्फ वह किया, जिसमें उसकी रुचि थी। वह कह रहा था, मैं वह पाने की कोशिश कर रहा था, जो मुझे अच्छा नहीं लगता था। इसलिए मुझे कई गुना ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही थी और कोई परिणाम भी नहीं मिल रहा था। लेकिन जब मैंने वह किया, जिसमें मेरी रुचि थी, तो मुझे सफलता तुरंत मिली। इसीलिए आज मैं यह निर्णय मोनू पर छोड़ता हूं कि उसे जिंदगी में क्या करना है। बेटा, तुम्हें मेरी कोई भी मदद चाहिए, तो मैं हाजिर हूं।
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