फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Wellness ›   improve your vision with knowledge asharam bapu pravachan

अपनी दृष्टि ज्ञानमय बनाएं: आशाराम बापू

Sat, 29 Jun 2013 12:48 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Sat, 29 Jun 2013 12:48 PM IST
विज्ञापन
improve your vision with knowledge asharam bapu pravachan

जगत कैसा है? पहले देखो, आपके मन का भाव कैसा है? जैसा आपका भाव होता है, जगत वैसा ही भासित होता है। सुर (देवत्व का) भाव होता है तो आप सज्जनता का, सद्गुण का नजरिया ले लेते हैं और आसुरी भाव होता है तो आप दोषारोपण का नजरिया ले लेते हैं। जिस एंगल से फोटो लो वैसा दिखता है। जगत में न सुख है न दुःख है, न अपना है न पराया है। आप राग से लेते हैं, द्वेष से लेते हैं कि तटस्थता से लेते हैं। आप जैसा लेते हैं ऐसा ही जगत दिखने लगता है।

विज्ञापन


कोई भी जगत का व्यवहार किया जाता है तो उसे सच्चा समझकर चित्त को उससे विह्वल न करो, नहीं तो आसुरी वृत्ति हो जायेगी, शोक हो जायेगा, दुःख हो जायेगा। अच्छा होता है तो उसका अहंकार न करो। हो-होके बदलनेवाला जगत है, यह द्वैतमात्र है- या तो सुख या तो दुःख। इन दोनों के बीच का तीसरा नेत्र खोलो ज्ञान का। आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा है ज्ञानमयी दृष्टि करना- सुख में भी न उलझना, दुःख में भी न उलझना।
विज्ञापन


न खुशी अच्छी है, न मलाल अच्छा है।
यार तू अपने-आपको दिखा दे, बस वो हाल अच्छा है॥
प्रभु! तू अपनी चेतनता, अपनी सत्यता, अपनी मधुरता दे।
दायां-बायां पैर पगडण्डी पर, सीढ़ियों पर रखते-रखते देव के मंदिर में पहुंचते हैं, ऐसे ही सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु इनको पैरों तले कुचलते-कुचलते जीवनदाता के स्वरूप का ज्ञान पाना चाहिए, उसी में विश्रांति पानी चाहिए, उसी में प्रीति होनी चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


हम अच्छे बुरे या हां ना में उत्तर देते हैं। यह सब ज्ञान के कारण होता है। यह है इन्द्रियों का ज्ञान। इन्द्रियों की गहराई में मन का ज्ञान। मन की गहराई में बुद्धि का ज्ञान। लेकिन इन्द्रियां, मन और बुद्धि में ज्ञान कहां से आता है? ‘मैं’ से। ‘मैं’ माना वही चैतन्य, जहां से ‘मैं’ स्फुरित होता है। सबको ‘मैं’ चाहिए। जहां से ‘मैं’ उठता है उस चैतन्य का सुख चाहिए। है न! कोई बोलता है: ‘‘मैं हूँ, तुम नहीं हो।’’ तो क्या आप मानोगे?

आप बोलोगे: ‘‘मैं भी हूँ। मैं कैसे नहीं हूं? मैं हूं तभी तुम हो। मैं हूं तभी तुम दिखते हो।’’ ‘मैं’ ही मेरे में तृप्त है। ‘मैं, मैं, मैं, मैं...’ ये आकृतियाँ अनेक हैं, अंतःकरण अनेक हैं लेकिन ‘मैं’ की सत्ता एक है। उसी ‘मैं’ में आराम पाओ। गहरी नींद में आप अपने ‘मैं’ में ही तो जाते हो, और क्या है?

उस मूल ज्ञान को ‘मैं’ के रूप में जान लिया तो आपका तो काम हो गया, देवत्व प्रकट हो गया लेकिन आपकी वाणी सुननेवाले को भी महापुण्य होगा।
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध॥
सुख देवें दुःख को हरें, करें पाप का अंत।
कह कबीर वे कब मिलें, परम सनेही संत॥

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आसारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय

संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स, परामनोविज्ञान समाचार, स्वास्थ्य संबंधी योग समाचार, सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed