{"_id":"5b7fdb2a42c7924657041b7c","slug":"if-there-is-a-sense-of-fighting-against-injustice-then-all-obstacles-are-solve","type":"story","status":"publish","title_hn":"सीख: अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज्बा हो, तो सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं","category":{"title":"Wellness","title_hn":"पॉज़िटिव लाइफ़","slug":"wellness"}}
सीख: अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज्बा हो, तो सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
Updated Fri, 24 Aug 2018 03:47 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
केशवी की कहानी, जिसने अपने कॉलेज में नकल के खिलाफ छेड़ी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लिया।
विज्ञापन
केशवी और उसके दोस्त जिस कॉलेज में पढ़ते थे, वहां पिछले कुछ साल से परीक्षाओं के समय नकल के मामले लगातार सामने आ रहे थे। यह नकल कॉलेज के ही कुछ लोग करवा रहे थे। शुरू में केशवी और उसके दोस्तों ने नकल के खिलाफ जागरूकता फैलाने की कोशिश की। उन्होंने कर्मचारियों से लेकर प्रिंसिपल तक बात की, पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला। उल्टे केशवी और उसके दोस्तों को कॉलेज के कुछ गुंडे आते-जाते परेशान करने लगे।
एक प्रोफेसर ने राय दी कि जब खुली मुट्ठी से सफलता हासिल न हो, तो मुट्ठी बंद कर लेनी चाहिए। यानी जब अकेले बात न बने, तो भीड़ का समर्थन लेना चाहिए। केशवी और उसके दोस्तों ने ऑनलाइन कैंपेन कर कॉलेज के सारे छात्रों को इकट्ठा कर लिया। अंत में कॉलेज प्रबंधन को छात्रों के सामने झुकना पड़ा और उन्होंने मामले की जांच और अपराधियों को कड़ी सजा देने का एलान भी किया। पर इसके तुरंत बाद कॉलेज प्रबंधन ने अगली परीक्षाओं की घोषणा कर दी और यह एलान भी कर दिया कि जो छात्र परीक्षाएं नहीं देंगे, उन्हें फिर परीक्षा देने का मौका नहीं दिया जाएगा।
विज्ञापन
लिहाजा करियर खराब होने के डर से सारे छात्र कॉलेज जाने लगे और परीक्षाएं देने लगे। कुछ ही दिनों में नकल की प्रक्रिया फिर शुरू हो गई। जब केशवी और उसके दोस्तों ने प्रबंधन से उनकी घोषणाओं के बारे में दोबारा पूछा, तो प्रबंधन ने कहा, हमने वे एलान भीड़ के दबाव में किए थे। केशवी दोबारा अपने प्रोफेसर की शरण में पहुंची। प्रोफेसर ने फिर से उसे लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। इस बार केशवी के साथ खड़े होने वाले लोग कम थे, और प्रबंधन भी अवरोध बनकर खड़ा था। केशवी को दो साल फेल भी होना पड़ा, पर उसने हार नहीं मानी और नकल के खिलाफ नया कानून लागू करवाकर ही छोड़ा।
विज्ञापन