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जब एक पिता की दुआ ने बचा ली मरते हुए बेटे की जान
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Tue, 18 Jun 2013 08:41 AM IST
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पिता हमेशा अपने बच्चों की खैर चाहता है। इनके मन में एक ही चाहत होती है कि उनकी संतान सुखी रहे। कोई भी पिता अपने बीमार और मौत के मुंह में जा रहे बच्चे को देखकर तड़प उठता है। पिता चाहे गरीब हो या फिर बादशाह। पिता यही चाहता है कि भले उसकी जान चली जाए लेकिन उसकी संतान को कुछ न हो।
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ऐसा ही एक वाकया है जब एक बादशाह ने अपनी दुआओं से न सिर्फ बेटे की जान बचायी बल्कि उसकी दुआओं का ही नतीजा था कि मुगल शासकों ने करीब तीन सौ साल तक हिन्दुस्तान पर राज किया।
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यह किस्सा उस पिता की है जिसने भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की, इसका नाम था 'ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर'। बाबर के छह संतान हुए। इनमें चार पुत्र थे। इन पुत्रों में बाबर को सबसे अधिक प्रिय हुमांयू था।
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हुमांयू सबसे योग्य था इसलिए बाबर ने इसे अपना उत्तराधिकारी चुना था। लेकिन जब हुमायूं करीब 22 वर्ष का हुआ तब दिल्ली में एक महामारी फैली जिसकी चमेट में हुमांयू भी आ गया। वैद्य हकीमों की कोई दवा काम नहीं आ रही थी।
हकीमों ने बाबर से कह दिया कि अब सिर्फ ऊपर वाला ही जान बचा सकता है। जब सब तरफ से उम्मीद टूट गयी तब बाबर हुमांयू के कमरे में गया और बिस्तर पर पड़े हुए हुमांयू के चारों ओर तीन बार घूमा।
इसके बाद बाबर अल्लाह से दुआ मांगने बैठ गया। बाबर ने कहा कि अगर उन्हें किसी की जान लेनी ही है तो बेशक वह मेरी जान ले लें लेकिन मेरी औलाद को बख्श दें।
अल्लाह ने बाबर की दुआ कुबूल करली। उसी दिन से हुमांयू की तबियत ठीक होने लगी और बाबर का स्वास्थ अचानक गिरने लगा। हुमांयू जैसे ही तंदुरूस्त हुआ बाबर की मृत्यु हो गयी।