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पृथ्वी जब कुपित होती है, तो ऐसे अनर्थ खड़े करती है कि जीवन दूभर हो जाए
पूनम नेगी
Updated Fri, 01 Jun 2018 02:47 PM IST
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earth
ऋषियों ने सूर्य को जगत की आत्मा कहा है। बृहदारण्यक उपनिषद में उल्लेख है कि पर्यावरण में वायु और अंतरिक्ष के कारण सृष्टि के सभी तत्वों को शक्ति मिलती है, जिससे विकास की गति अग्रसर होती है। इसका मूल विषय प्राणविद्या है। वाल्मीकि रामायण में वन, पर्वत, फल-फूल, नदियों व पशु-पक्षियों आदि का मनोरम वर्णन है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'मैं ही पृथ्वी में प्रवेश कर सब प्राणियों को धारण करता हूं। चंद्रमा बनकर औषधियों का पोषण करता हूं।'
ऋषियों ने पर्यावरण संरक्षण में विशेष योगदान के कारण वृक्षों के प्रति अगाध अनुराग व्यक्त किया है। वृक्ष हमारे लिए प्राण वायु का संचार करते हैं। यही वजह है कि हमारे यहां पर वृक्ष पूजा का प्रचलन अति प्राचीन है। इस पंरपरा को आधुनिकता की आग ने भारी नुकसान पहुंचाया। दोहन, शोषण, वैभव एवं विलास की रीति-नीति ने पर्यावरण को घोर संकट में डाल दिया है। सभी ओर विपन्नता है, प्राकृतिक आपदाओं का क्रूर तांडव है। पिछली दो शताब्दियों में छाई घोर लालची सोच ने इस मुकाम पर ला खड़ा किया है। पृथ्वी जब कुपित होती है, तो ऐसे अनर्थ खड़े करती है कि जीवन दूभर हो जाए। इन दिनों यही हो रहा है। अपने आचरण व्यवहार से प्रकृति का कोप को शांत करें, तभी हम शांत और सुखी हो सकेंगे।
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ऋषियों ने पर्यावरण संरक्षण में विशेष योगदान के कारण वृक्षों के प्रति अगाध अनुराग व्यक्त किया है। वृक्ष हमारे लिए प्राण वायु का संचार करते हैं। यही वजह है कि हमारे यहां पर वृक्ष पूजा का प्रचलन अति प्राचीन है। इस पंरपरा को आधुनिकता की आग ने भारी नुकसान पहुंचाया। दोहन, शोषण, वैभव एवं विलास की रीति-नीति ने पर्यावरण को घोर संकट में डाल दिया है। सभी ओर विपन्नता है, प्राकृतिक आपदाओं का क्रूर तांडव है। पिछली दो शताब्दियों में छाई घोर लालची सोच ने इस मुकाम पर ला खड़ा किया है। पृथ्वी जब कुपित होती है, तो ऐसे अनर्थ खड़े करती है कि जीवन दूभर हो जाए। इन दिनों यही हो रहा है। अपने आचरण व्यवहार से प्रकृति का कोप को शांत करें, तभी हम शांत और सुखी हो सकेंगे।
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