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ध्यान की अवस्था के साथ ही जन्म लेते हैं हमः ओशो

Thu, 13 Dec 2012 10:55 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Thu, 13 Dec 2012 10:55 AM IST
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everybody born in meditative state osho
ध्यान चेतना की विशुद्ध अवस्था है-जहां कोई विचार नहीं होते, कोई विषय नहीं होता। साधारणतया हमारी चेतना विचारों से, विषयों से, कामनाओं से आच्छादित रहती है। जैसे कि कोई दर्पण धूल से ढंका हो। हमारा मन एक सतत प्रवाह का है- विचार चल रहे हैं, कामनाएं चल रही हैं, पुरानी स्मृतियां सरक रही हैं- रात-दिन एक अनवरत सिलसिला है। नींद में भी हमारा मन चलता रहता है, स्वप्न चलते रहते हैं। यह अ-ध्यान की अवस्था है। ठीक इससे उलटी अवस्था ध्यान की है।
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जब कोई विचार नहीं चलते और कोई कामनाएं सिर नहीं उठातीं, सारा ऊहापोह शांत हो जाता है और हम परिपूर्ण मौन में होते हैं-वह परिपूर्ण मौन ध्यान है। और उसी परिपूर्ण मौन में सत्य का साक्षात्कार होता है। जब मन नहीं होता, तब जो होता है वह ध्यान है। इसलिए मन के माध्यम से कभी ध्यान तक नहीं पहुंचा जा सकता। ध्यान इस बात का बोध है कि मैं मन नहीं हूं। जैसे-जैसे हमारा बोध गहरा होता है, कुछ झलकें मिलनी शुरू होती हैं-मौन की, शांति की-जब सब थम सा जाता है और मन में कुछ भी चलता नहीं। उन मौन, शांत क्षणों में ही हमें स्वयं की सत्ता की अनुभूति होती है और इस अस्तित्व के रहस्य का स्पर्श होता है।
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धीरे-धीरे एक दिन आता है, एक बड़े सौभाग्य का दिन आता है, जब ध्यान हमारी सहज अवस्था हो जाता है। मन असहज अवस्था है। यह हमारी सहज-स्वाभाविक अवस्था कभी नहीं बन सकता। ध्यान हमारी सहज अवस्था है, लेकिन हमने उसे खो दिया है। हम उस स्वर्ग से बाहर आ गए हैं। लेकिन यह स्वर्ग पुनः पाया जा सकता है। किसी बच्चे की आंखों में झांकें-और वहां आपको अदभुत मौन दिखेगा, अदभुत निर्दोषता दिखेगी।
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हर बच्चा ध्यान को लिए हुए ही पैदा होता है- लेकिन उसे समाज के रंग-ढंग सीखने ही होंगे। उसे विचार करना, तर्क करना, हिसाब-किताब, सब सीखना ही होगा। उसे शब्द, भाषा, व्याकरण सीखना ही होगा। और, धीरे-धीरे वह अपनी निर्दोषता, सरलता से दूर हटता जाएगा। उसकी कोरी स्लेट समाज की लिखावट से गंदी होती जाएगी। वह समाज के ढांचे में एक कुशल यंत्र हो जाएगा-एक जीवंत, सहज मनुष्य नहीं।

बस उस निर्दोष सहजता को पुनः उपलब्ध करने की जरूरत है। उसे हमने पहले जाना है। इसलिए जब हमें ध्यान की पहली झलक मिलती है तो एक बड़ा आश्चर्य होता है कि इसे तो हम जानते हैं! और यह प्रत्यभिज्ञा बिलकुल सही है-हमने इसे पहले जाना है। लेकिन हम भूल गए हैं। हीरा कूड़े-कचरे में दब गया है। लेकिन अगर हम जरा ही खोदें तो हीरा पुनः हाथ आ सकता है- वह हमारा स्वभाव है। उसे हम खो नहीं सकते; उसे हम केवल भूल सकते हैं।


हम ध्यान में ही पैदा होते हैं। फिर हम मन के रंग-ढंग सीख लेते हैं। लेकिन हमारा वास्तविक स्वभाव अंतर्धारा की तरह भीतर गहरे में बना ही रहता है। किसी भी दिन, थोड़ी सी खुदाई, और हम पाएंगे कि वह धारा अभी भी बह रही है, जीवन-स्रोत के झरने ताजा जल अभी भी ला रहे हैं। और उसे पा लेना जीवन का सबसे बड़ा आनंद है।

परिचय
ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये। ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये। 

साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली

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