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कामयाब जीवन के लिए ये छह मंत्र याद रखें: आशाराम बापू

Sat, 22 Dec 2012 12:45 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Sat, 22 Dec 2012 12:45 PM IST
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asharam bapu mantra for successful life

मानव में अथाह सामर्थ्य है। उसकी बुद्धिमत्ता का ही चमत्कार है दिनोंदिन एक-से-एक सफलता को प्राप्त करते जा रहे है। परंतु सभी सफल नही होते। सफलता हर कोई चाहता है। इसे प्राप्त करना कोई कठिन कार्य भी नहीं है। यदि आप भी सफल होना चाहते है तो इन छः बातों को याद रखें:

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(1) लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए।
(2) जीवन में उत्साह बनाए रखें। 
(3) भगवान में एवं अपने-आपमें श्रद्धा बनी रहे।
(4) किस पर भरोसा करें, किस पर नहीं? सावधान रहें।
(5) जीवन में धर्म होना चाहिए।
(6) अंतिम यात्रा कैसी हो?

एक तो अपने लक्ष्य का निश्चय कर लें, अपना लक्ष्य ऊँचा बना लें। दो प्रकार के लक्ष्य होते हैं- एक होता है वास्तविक लक्ष्य, दूसरा होता है अवांतर लक्ष्य। परम सुख, परम ज्ञान, परम मुक्त अवस्था को पाना, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान पाना यह वास्तविक लक्ष्य है। खाना-पीना, कमाना और इनके सहायक कर्म यह अवांतर लक्ष्य है।
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दूसरी बात है मन में उत्साह बना रहे। उत्साह का मतलब है सफलता, उन्नति, लाभ और आदर के समय चित्त में काम करने का जैसा जोश, तत्परता, बल बना रहता है, ठीक ऐसा ही प्रतिकूल परिस्थिति में भी बना रहे। जिसका उत्साह टूटा, मानो उसका जीवन विफल हो गया। उत्साहहीन जीवन व्यर्थ है।
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तीसरी बात है ईश्वर पर और अपने पर भरोसा रखें। ऊँचे लोगों पर भरोसा रखें। ऊँचे-में-ऊँचे हैं परमात्मा, जो परमात्मा के नाते जीवनयापन करते हैं ऐसे लोगों की बातों पर दृढ़ विश्वास रखें। चौथी बात है किस पर कितना विश्वास रखें, किस पर न रखें? कर्म करने में, विचार करने में, संग करने में, विश्वास करने में सावधान रहें। किसकी बात पर विश्वास करें?

पाँचवीं बात है जीवन में धर्म का नियंत्रण हो। जीवन में धर्म का नियंत्रण होगा तो अनुचित कार्यों पर रोक लग जायेगी और उचित होने लगेगा, अनुचित में समय एवं शक्ति बर्बाद नहीं होगी। छठी बात है अपनी अंतिम यात्रा कैसी हो? आखिर में कैसे मरना है यह याद रहे, मरना तो पड़ेगा ही। चिंता लेकर मरना है, तड़पते हुए मरना है, अधूरा काम छोड़कर मरना है, कुछ पाते-पाते या छोड़ते-छोड़ते मरना है, भय लेकर मरना है अथवा वासना के जाल में छटपटाते हुए मर कर बाद में कई जन्मों में भटकना पड़े ऐसे मरना है? नहीं! निश्चिंत होकर, पूर्णकाम होकर, आप्तकाम होकर मरना है।

कोई इच्छा, कोई वासना न रहे, हमारे जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाय बस। इस बात का अभ्यास रोज करते रहना चाहिए। इससे जीवन निर्भार रहेगा, निर्दुःख रहेगा। इस जीवन को अपने पूर्ण तत्त्व का अनुभव करनेवाला जीवन बनाना चाहिए।

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम


संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से  सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं। 

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