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अमृतवाणी : फल-फूल नहीं भाव के भूखे हैं भगवान
पं.श्रीराम शर्मा आचार्य
Updated Wed, 19 Sep 2018 02:58 PM IST
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bhakti
ईश्वर का दंड एवं उपहार दोनों ही असाधारण हैं। इसलिए आस्तिक को इस बात का सदा ध्यान रहेगा कि दंड से बचा जाए और उपहार प्राप्त किया जाए। यह प्रयोजन छुट-पुट पूजा-अर्चना, जप-ध्यान से पूरा नहीं हो सकता। भावनाओं और क्रियाओं को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालने से ही यह प्रयोजन पूरा होता है।
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प्रसन्न होकर ईश्वर नहीं करता पक्षपात
न्यायनिष्ठ जज की तरह ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। स्तवन अर्चन करके उसे उसके नियम विधान से विचलित नहीं किया जा सकता है। अपना गुणगान करने वाले के साथ यदि वह पक्षपात करने लगे, तब उसकी न्याय व्यवस्था का कोई मूल्य न रहेगा, सृष्टि की सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाएगी। सबको अनुशासन में रखने वाला परमेश्वर स्वयं भी नियम व्यवस्था में बँधा है। यदि कुछ उच्छृंखलता एवं अव्यवस्था बरतेगा तो फिर उसकी सृष्टि में पूरी तरह अंधेरा फैल जाएगा। फिर कोई उसे न तो न्यायकारी कहेगा और न समदर्शी। तब उसे खुशमादी या रिश्वतखोर नाम से पुकारा जाने लगेगा, जो चापलूस स्तुति सा कर पुष्प-नैवेद्य भेंट कर दें, उससे प्रसन्न।
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किन्हें मिलता है ईश्वर का दंड
भगवान को हम सर्वव्यापक एवं न्यायकारी समझकर गुप्त या प्रकट रूप से अनीति अपनाने का कभी भी, कहीं भी साहस न करें। ईश्वर के दंड से डरें। उसका भक्त वत्सल ही नहीं, भयानक रौद्र रूप भी है। उसका रौद्र रूप ईश्वरीय दंड से दंडित असंख्यों रुग्ण, अशक्त, मूक, वधिर, अंध, अपंग, कारावास एवं अस्पतालों में पड़े हुए कष्टों से कराहते हुए लोगों की दयनीय दशा को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। केवल बंशी बजाने वाले और रास रचाने वाले ईश्वर का ही ध्यान न रखें, उसका त्रिशूलधारी भी एक रूप है, जो असुरता में निमग्र दुरात्माओं का नृशंस दमन, मर्दन भी करता है। न्यायनिष्ठ जज को जिस प्रकार अपने सगे संबंधियों, प्रशंसक मित्रों तक को कठोर दंड देना पड़ता है, फाँसी एवं कोड़े लगाने की सजा देने को विवश होना पड़ता है, वैसे ही ईश्वर को भी अपने भक्त-अभक्त का, प्रशंसक-निंदक का भेद किए बिना उसके शुभ-अशुभ कर्मों का दंड पुरस्कार देना होता है। ईश्वर हमारे साथ पक्षपात करेगा, सत्कर्म न करते हुए भी विविध सफलताएँ देगा या दुष्कर्म करते रहने पर भी दंड से बचे रहने की व्यवस्था कर देगा, ऐसा सोचना नितांत भूल है।
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कैसी हो ईश्वर की उपासना
उपासना का उद्देश्य ईश्वर से अनुचित पक्षपात करना नहीं होना चाहिए, वरन यह होना चाहिए कि वह हमें अपनी प्रसन्नता के प्रमाणस्वरूप सद्भावनाओं से ओत-प्रोत रहने, सत्प्रवृत्तियों में संलग्र रहने की प्रेरणा, क्षमता एवं हिम्मत प्रदान करे, भय एवं प्रलोभन के अवसर आने पर भी सत्पथ से विचलित न होने की दृढ़ता प्रदान करे यही ईश्वर की कृपा का सर्वश्रेष्ठ चिन्ह है। पापों से डर और पुण्य से प्रेम, यही तो भगवद्-भक्त के प्रधान चिन्ह हैं। कोई व्यक्ति आस्तिक है या नास्तिक, इसकी पहचान किसी तिलक, जनेऊ, कंठी, माला, पूजा-पाठ, स्नान, दर्शन आदि के आधार पर नहीं, वरन् भावनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को देखकर ही की जा सकती है। आस्तिक की मान्यता प्राणिमात्र में ईश्वर की उपस्थिति देखती है। इसलिए उसे हर प्राणी के साथ उदारता, आत्मीयता एवं सेवा सहायता से भरा मधुर व्यवहार करना पड़ता है।
भाव के भूखे हैं भगवान
भक्ति का अर्थ है- प्रेम। जो प्रेमी है, वह अपने प्रियतम को सर्वव्यापक देखेगा और सभी से अत्यंत सौम्यता पूर्ण व्यवहार करके अपनी भक्ति भावना का परिचय देगा। ईश्वर दर्शन का यही रूप है। हर चर-अचर में छिपे हुए परमात्मा को जो अपनी ज्ञान दृष्टि से देख सका और तदनुरूप अपने कर्तव्य का निर्धारण कर सका, मानना चाहिए कि उसे ईश्वर दर्शन का लाभ मिल गया। अपने में परमेश्वर को और परमेश्वर में अपने को देखने की दिव्य दृष्टि जिसे प्राप्त हो गई, समझना चाहिए कि उसने पूर्णता का जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।