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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Shani Jayanti Shani Dev Birth Story from Skanda Purana The Real Origin in Ujjain

Shani Jayanti Vishesh: उज्जैन का पवित्र स्थान जहां शनिदेव का जन्म हुआ, जानिए स्कन्द पुराण की अमर कथा

Sun, 25 May 2025 07:56 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: श्वेता सिंह Updated Sun, 25 May 2025 07:56 PM IST
सार

Shani Dev Janm Katha: भगवान शनिदेव को केवल भय और दंड से नहीं देखना चाहिए। वे न्याय के देवता, कर्मफलदाता और धैर्य, तप व सुधार के प्रतीक हैं। जो व्यक्ति संयमित जीवन जीता है, सत्य के मार्ग पर चलता है शनि उसके रक्षक बन जाते हैं। उनका जन्म स्थान उज्जैन का त्रिवेणी संगम, आज भी हमें यह संदेश देता है कि हर तप, हर त्याग और हर न्याय का फल निश्चित है।

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Shani Jayanti Shani Dev Birth Story from Skanda Purana The Real Origin in Ujjain
shani jayanti - फोटो : adobe

विस्तार

Shani Jayanti Vishesh: भारतवर्ष की पावन भूमि देवताओं, ऋषियों और तपस्वियों की लीला स्थली रही है। यहां की प्रत्येक नदी, पर्वत और वन किसी न किसी दिव्य कथा को समेटे हुए हैं। ऐसी ही एक अनुपम कथा जुड़ी है भगवान शनि देव से, जिनका जन्म उज्जैन में स्थित त्रिवेणी संगम के पवित्र स्थल पर हुआ था।

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यह प्रसंग स्कंद पुराण के पंचम खंड अवंती खंड के "क्षाता संगम माहात्म्य" अध्याय (अध्याय 67, श्लोक 46–55) में विस्तार से वर्णित है। आइए, इस दिव्य कथा को जानें और उस पवित्र स्थल की महिमा को समझें जहां कर्मों के न्यायाधीश शनि देव ने जन्म लिया।
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Shani Jayanti Shani Dev Birth Story from Skanda Purana The Real Origin in Ujjain
shani jayanti - फोटो : adobe stock

सूर्य, संध्या और छाया की कथा से प्रारंभ
भगवान सूर्य का विवाह त्वष्टा विश्वकर्मा की पुत्री संध्या से हुआ था। संध्या से सूर्य देव को तीन संतानें प्राप्त हुईं। मनु, यम, और यमुना। परंतु सूर्य का तेज संध्या के लिए असहनीय था। अतः उन्होंने अपनी ही छाया से एक प्रतिरूप उत्पन्न किया और उसका नाम रखा छाया। संध्या स्वयं तपस्या करने के लिए अपने पिता के घर लौट गईं, और छाया को सूर्य देव की सेवा में नियुक्त कर दिया।

संध्या अपने पिता के क्रोध से व्यथित होकर उज्जैन के महाकाल वन में जाकर घोड़ी का रूप धारण कर गहन तपस्या करने लगीं। इधर छाया के द्वारा यम को पीड़ा पहुँचाए जाने पर सूर्य देव को संदेह हुआ, और ध्यानस्थ होने पर उन्हें संध्या की वास्तविक स्थिति का ज्ञान हुआ।

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shani jayanti - फोटो : अमर उजाला

महाकाल वन में तप और अश्विनी कुमारों का जन्म
सूर्य देव संध्या की खोज में महाकाल वन पहुंचे, जहां  क्षिप्रा और क्षाता नदियों का संगम होता है (आज का त्रिवेणी संगम)। संध्या वहां घोड़ी के रूप में तपस्या कर रही थीं। सूर्य ने भी घोड़े का रूप धारण किया और संध्या के समीप गए। उनके संयोग से संध्या की नासिका से दो पुत्रों का जन्म हुआ,ये थे अश्विनीकुमार, देवताओं के वैद्य। नासिका से उत्पन्न होने के कारण इन्हें "नासाग्र" भी कहा जाता है।

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shani jayanti - फोटो : अमर उजाला

शनि देव का जन्म 
उसी समय वहां छाया भी पहुँचीं। वे गर्भवती थीं और संगम तट पर ही उन्होंने एक पुत्र और एक कन्या को जन्म दिया। कन्या का नाम रखा गया तापी, जो तपस्या कर नदी बन गईं। पुत्र का नाम हुआ शनैश्चर यानी धीरे चलने वाला, समय का प्रतिनिधि और कर्म का दंडाधिकारी। इसी कारण यह स्थान शनि जन्म भूमि के रूप में जाना जाता है।

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shani jayanti - फोटो : अमर उजाला

त्रिवेणी संगम की महिमा
जहां क्षिप्रा, क्षाता, और गुप्त सरस्वती नदियाँ मिलती हैं, उसे त्रिवेणी संगम कहते हैं। यह स्थान मोक्ष प्रदायक माना गया है। यहां स्नान, दान और स्थावरेश्वर महादेव के दर्शन से समस्त पापों का नाश होता है और शनि पीड़ा का शमन होता है।

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shani jayanti - फोटो : adobe stock

नवग्रहों की तपस्थली
स्कंद पुराण के अनुसार नवग्रहों ने भी इस पावन स्थल पर आकर शिवलिंग स्थापित किए और तपस्या कर भगवान शिव से वरदान प्राप्त किए। उनके द्वारा स्थापित लिंगों के नाम हैं- नरादित्य, सोमेश्वर, मंगलेश्वर, बुधेश्वर, बृहस्पतीश्वर, शुक्रेश्वर, स्थावरेश्वर, मुनीश्वर, राहु-केतुऐश्वर। इसी कारण यह स्थान नवग्रह त्रिवेणी शनि मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

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शनि देव के नाम और स्तोत्र
शनि देव के अनेक नाम हैं, जिनके जाप से शनि की पीड़ा शांत होती है:

सौरिः शनैश्चरो मन्दः कृष्णोऽनन्तोऽन्तको यमः।
पिङ्गश्छायासुतो बभ्रुः स्थावरः पिप्पलायनः॥
(स्कंद पुराण 5/1/67/53-54)

जो मनुष्य प्रातःकाल इन नामों का पाठ करता है, उसे शनि जनित पीड़ा नहीं होती।

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shani jayanti - फोटो : अमर उजाला

शनि का रंग क्यों हुआ काला?
कालिका पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तब उनके नेत्रों से अग्निस्वरूप आंसू निकले, जिनसे त्रिलोक जलने लगा। उस समय देवताओं ने शनि देव से निवेदन किया कि वे उन आंसुओं को पी जाएं। शनि देव ने त्रिलोक की रक्षा हेतु उन्हें पी लिया, जिससे उनका शरीर हमेशा के लिए काला पड़ गया।

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shani jayanti - फोटो : freepik

शनि देव के अन्य तपस्थल
काशी में भगवान शिव की तपस्या करके शनि देव ने ग्रह का पद प्राप्त किया। गोदावरी नदी के तट पर, वर्तमान शनि शिंगणापुर में उन्होंने गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप किया।

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shani jayanti - फोटो : self

राजा विक्रमादित्य द्वारा शनि मंदिर की स्थापना
उज्जैन के त्रिवेणी संगम पर ही राजा विक्रमादित्य ने भगवान शनिदेव और नवग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा करवाई और एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। आज भी यह स्थान भक्तों के लिए आस्था और शांति का केंद्र बना हुआ है। यहां शनि देव के साथ दाईं ओर श्री गणेश जी, बाईं ओर ढैय्या शनि, पीछे श्री बालाजी हनुमान विराजमान हैं।

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shani jayanti - फोटो : अमर उजाला

शनिदेव केवल दंडाधिकारी नहीं, मार्गदर्शक हैं

भगवान शनिदेव को केवल भय और दंड से नहीं देखना चाहिए। वे न्याय के देवता, कर्मफलदाता और धैर्य, तप व सुधार के प्रतीक हैं। जो व्यक्ति संयमित जीवन जीता है, सत्य के मार्ग पर चलता है शनि उसके रक्षक बन जाते हैं। उनका जन्म स्थान उज्जैन का त्रिवेणी संगम, आज भी हमें यह संदेश देता है कि हर तप, हर त्याग और हर न्याय का फल निश्चित है।

                                                                                                                                 
                                                

                                                                                                                                 
                                                डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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