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Pitru Paksha 2023: गया में ही क्यों किया जाता है पूर्वजों का पिंडदान? यहां जानें वजह और महत्व

Mon, 02 Oct 2023 12:52 PM IST
आशिकी पटेल धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आशिकी पटेल Updated Mon, 02 Oct 2023 12:52 PM IST
सार

Pitru Paksha 2023: मान्यता है कि गया तीर्थ में श्राद्ध कर्म पूर्ण करने के बाद भगवान विष्णु के दर्शन करने से मनुष्य पितृ, माता और गुरु के ऋण से मुक्त हो जाता है।
 

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pitru paksha 2023 why is pind daan done only in gaya know its reason and importance in hindi
गया में ही क्यों किया जाता है पूर्वजों का पिंडदान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पं. ज्ञानदेव आचार्य
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Pitru Paksha 2023: गयासुर नाम के एक असुर ने घोर तपस्या करके भगवान से आशीर्वाद प्राप्त किया। फिर वह आशीर्वाद का दुरुपयोग करके देवताओं को ही परेशान करने लगा। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे गयासुर से देवताओं की रक्षा करें। भगवान विष्णु ने गदा से गयासुर का वध कर दिया। बाद में उन्होंने गयासुर के सिर पर एक पत्थर रखकर उसे मोक्ष प्रदान किया। कहते हैं, गया स्थित विष्णुपद मंदिर में वह पत्थर आज भी मौजूद है। भगवान विष्णु द्वारा गदा से गयासुर का वध किए जाने से उन्हें गया तीर्थ में मुक्तिदाता माना गया। गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किए जाने के बारे में इस प्राचीन कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है।

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धर्मशास्त्र के अनुसार गया की 54 वेदियों में विष्णु पद प्रथम है। इसके दर्शन मात्र से पितर नारायण रूप हो जाते हैं। गया की फल्गु नदी में स्नान और तर्पण करने से पितरों को देव योनि प्राप्त होती है। हिंदू समाज का दृढ़ विश्वास है कि गया में श्राद्ध पिंडदान करने से उनकी सात पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिल जाती है। 
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कहा जाता है कि गया में यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान करने से मनुष्य को स्वर्गलोक एवं ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। गया के धर्म पृष्ठ, ब्रह्म सप्त, गया शीर्ष और अक्षय वट के समीप जो कुछ भी पितरों को अर्पण किया जाता है, वह अक्षय होता है। गया के प्रेतशिला में पिंडदान करने से पितरों का उद्धार होता है। 


पिंडदान करने के लिए काले तिल, जौ का आटा, खीर, चावल, दूध, सत्तू आदि का प्रयोग किए जाने का विधान है। अगर किसी मनुष्य की मृत्यु, संस्कार रहित दशा में अथवा किसी पशु, चोर, सर्प या जंतु के काटने से हो जाती है, तो गया तीर्थ में उस मृत व्यक्ति का श्राद्ध कर्म करने से वह बंधन मुक्त होकर स्वर्ग को गमन करता है। गया में दिन या रात में किसी भी समय श्राद्ध कर्म और तर्पण किया जा सकता है।

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और भी हैं तीर्थ
महाराष्ट्र में त्र्यंबकेश्वर, गंगासागर, हरियाणा में पिहोवा, उत्तर प्रदेश में गढ़गंगा और उत्तराखंड में हरिद्वार भी श्राद्ध कर्म के लिए उपयुक्त हैं। अकाल मृत्यु को प्राप्त होने वाले पितरों का श्राद्ध जगन्नाथपुरी और बीमारी से मृत्यु को प्राप्त होने वाले पितरों का श्राद्ध एवं पिंडदान ओंकारेश्वर में किया जाता है। जिनका वंश आगे नहीं बढ़ता और वे अकेले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, उनका पिंडदान पशुपतिनाथ अथवा कैलाश मानसरोवर में किया जाना चाहिए।

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