फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   know about shravanabelagola bahubali abhishek

जानिए चंद्रगिरि पर भद्रबाहु स्वामी और चन्द्रगुप्त मौर्य का कैसे हुआ आगमन 

Sun, 31 Dec 2017 10:30 AM IST
अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज
अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज Updated Sun, 31 Dec 2017 10:30 AM IST
विज्ञापन
know about shravanabelagola bahubali abhishek

श्रवणबेलगोला के चन्द्रगिरि पर्वत के प्राचीन नाम तो कटवप्र, तीर्थगिरी, ऋषिगिरी, छोटा पहाड़, नाभिक पहाड़, चिक्क बेट्टा आदि हैं लेकिन मुनि श्री चंद्रगुप्त मौर्य के कारण इस पर्वत का नाम चंद्रगिरि पर्वत ही पड़ गया। अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी चंद्रगुप्त सहित बारह  हजार मुनियों के साथ चंद्रगिरि पर्वत पर आत्म साधना करने आए थे। उत्तर भारत की उज्जयनी नगरी में जब बारह वर्षीय का अकाल पड़ा, उसी समय अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी ने अपने ज्ञान से जान लिया कि आने वाले समय में यहां पर अकाल पडऩे वाला है।

विज्ञापन


पढ़ें-12 साल के बाद श्रवणबेलगोला में होगा बाहुबली का महामस्तकाभिषेक, जानिए इसकी खास बातें
विज्ञापन


उसी समय वह अपने बारह हजार शिष्यों के साथ दक्षिण की ओर विहार कर अपनी आत्मसाधना का केंद्र चंद्रगिरि पर्वत को बनाकर शिष्यों के साथ आत्म साधना करने लगे। चंद्रगिरि पर्वत पर आत्मसाधना करते करते अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी को जब अपने ज्ञान से पता चला कि अब उनकी उम्र कम रह गई है तो उन्होंने अपने शिष्य विशाखाचार्य को अपना आचार्य पद दे कर उन्हें तमिल देश(वर्तमान का तमिलनाडू ) की ओर विहार करने की आज्ञा दे दी।
विज्ञापन
विज्ञापन


मात्र चंद्रगुप्त मौर्य, जो अपना राज्य छोड़ अपने पुत्र को गद्दी पर बैठाकर साथ आए थे, बाद में मुनि दीक्षा धारण कर जो मुनि चन्द्रगुप्त बन गए थे, वहीं मात्र गुरु आज्ञा से चंद्रगिरि पर्वत पर अपने गुरु अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी के पास सेवा करने रुक गए। 

know about shravanabelagola bahubali abhishek

भद्रबाहु स्वामी चंद्रगिरि पर्वत पर एक छोटी सी गुफा को अपनी साधना की स्थली बनाकर आत्म साधना में मग्न हो गए। साधना करते-करते उस गुफा में उनका समाधिमरण हुआ। भद्रबाहु स्वामी के साथ रुखे  मुनि चंद्रगुप्त ने अपने गुरु अंतिम श्रुतकेवली स्वामी के चरण वन्दना करते-करते 12 वर्ष चंद्रगिरि की गुफा में निकाल दिए।


मुनि चंद्रगुप्त जब आहारचर्या को वहीं जंगल में जाते तो उन्हें आहार मिल जाता था। एक दिन जब वह आहार कर आए तो उन्हें याद आया कि कमंडल तो वह आहार वाले स्थान पर भूल आए हैं तो वह वापस लेने गए तो कमंडल एक पेड़ पर टंगा हुआ था। दूर-दूर तक कोई नगर नहीं दिख रहा था। तब पता चला कि अब तक देवताओं ने आहार दान दिया है। यह सब गुरु भक्ति का ही फल था।


 चन्द्रगिरि पर्वत पर भद्रबाहु गुफा में आज भी हमें भद्रबाहु स्वामी के चरणों की वन्दना करने का अवसर प्राप्त होता है। कहा जाता कि अगर गुरु पूर्णिमा पर यहां बैठकर विशेष साधना करते हैं तो आज भी अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु स्वामी के साधना के कण का हमें स्पर्श होता है। चंद्रगुप्त मुनि के नाम से ही पर्वत का नाम बाद में चन्द्रगिरि पर्वत हुआ और साथ में ही चंद्रगिरि पर्वत पर एक मन्दिर(बसदी) का नाम भी चंद्रगुप्त बसदी है। इन दोनों गुरु-शिष्य का वर्णन प्राचीन शास्त्र में विस्तार से दिया गया है और श्रवणबेलगोला के शिलालेखों में भी मिलता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स,स्वास्थ्य संबंधी सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed