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17 अप्रैल को अनुसूया जयंती: नारी धर्म, तप और मातृत्व की प्रतीक देवी अनुसूया

Wed, 16 Apr 2025 03:19 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Wed, 16 Apr 2025 03:19 PM IST
सार

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि सती अनुसूया ने नारी धर्म की ऐसी पराकाष्ठा को सिद्ध किया, जिसे आज तक कोई लांघ नहीं सका। वे प्रजापति कर्दम और देवी देवहूति की पुत्री तथा महर्षि अत्रि की धर्मपत्नी थीं।

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anusuya jayanti 2025 date time importance and significance
- फोटो : Adobe Stock

विस्तार

हिंदू धर्म में नारी शक्ति की उपमा जब भी दी जाती है, तो सबसे पहले जिनका नाम स्मरण होता है, वह हैं सती अनुसूया। वे तप, त्याग और पतिव्रता धर्म की मूर्ति थीं। बैसाख मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सती अनुसूया जयंती मनाई जाती है और इस वर्ष यह पावन तिथि 17 अप्रैल को आ रही है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि सती अनुसूया ने नारी धर्म की ऐसी पराकाष्ठा को सिद्ध किया, जिसे आज तक कोई लांघ नहीं सका। वे प्रजापति कर्दम और देवी देवहूति की पुत्री तथा महर्षि अत्रि की धर्मपत्नी थीं।

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उनकी विद्या, विनय, सेवा और तप की ख्याति तीनों लोकों में थी। अनुसूया न केवल पतिव्रता थीं, बल्कि एक तपस्विनी, साध्वी और महान संत भी थीं। उन्होंने कठोर तप करके मंदाकिनी नदी को धरती पर अवतरित किया। कहा जाता है कि उनके तेज से आकाशमार्ग से गुजरते देवता तक प्रभावित होते थे। उनकी गणना पंचसतियों में सबसे पहले की जाती है, जिनमें द्रौपदी, मंदोदरी, सुलोचना और सावित्री शामिल हैं। उनके पतिव्रत की महिमा इतनी महान थी कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक उनकी परीक्षा लेने के लिए बाध्य हो गए।
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सती अनुसूया का जीवन केवल एक आदर्श पत्नी का ही नहीं, बल्कि मातृत्व और सेवा भावना की भी चरम अभिव्यक्ति है। आज भी महिलाएं इस दिन व्रत रखकर अपने पति की लंबी उम्र और सुखमय जीवन की कामना करते हुए अनुसूया माता का पूजन करती हैं।


त्रिदेवों की परीक्षा और मातृत्व की विजय
एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद पृथ्वी लोक से भ्रमण करते हुए देवी लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती के पास पहुंचे। नारदजी ने तीनों से कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूया के पतिव्रत धर्म की महिमा तीनों लोकों में अद्वितीय है। यह सुनकर तीनों देवियां ईर्ष्या वश उनके पतिव्रत की परीक्षा लेना चाहती थीं। उन्होंने अपने-अपने पति ब्रह्मा, विष्णु और महेश से अनुरोध किया। तीनों देवता अनुसूया की कुटिया पर पहुंचे और भिक्षा मांगते हुए कहा कि वे तभी भोजन करेंगे जब वह निर्वस्त्र होकर उन्हें भोजन कराएंगी। अनुसूया यह समझ गईं कि ये अतिथि साधारण नहीं हैं। उन्होंने अपने पति का स्मरण करते हुए मन ही मन कहा-यदि मेरा पतिव्रत अखंड है, तो ये तीनों अतिथि शिशु बन जाएं। इतना कहते हुए उन्होंने उन पर जल छिड़का और तीनों त्रिदेव बालक रूप में बदल गए।

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अनुसूया ने मातृत्व भाव से तीनों को भोजन कराया और पालने में सुला दिया। इधर जब देवता नहीं लौटे, तो तीनों देवियां चिंतित होकर नारदजी के साथ आश्रम पहुंचीं। उन्होंने शिशु रूप में त्रिदेवों को देखा और अनुसूया से क्षमा याचना की। अनुसूया ने फिर जल छिड़ककर उन्हें उनके वास्तविक रूप में लौटा दिया। त्रिदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि वे ‘दत्तात्रेय’नाम से उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। इस प्रकार सती अनुसूया का जीवन नारी धर्म, साधना और मातृत्व की अद्वितीय मिसाल बनकर आज भी पूजनीय है।

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