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आप भी इस विद्या को पाना चाहते हैं तो उस राजा की तरह बनें
वियोगी हरि
Updated Tue, 01 Jul 2014 02:50 PM IST
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ऋषि रैक्व बैलगाड़ी चलाकर जीविका चलाते थे। उनके बारे में विख्यात था कि वह ब्रह्मज्ञानी हैं। एक बार राजा जानश्रुति ब्रह्मविद्या सीखने के विचार से उनके पास पहुंचे। वह अपने साथ छह सौ गायें और रत्नों की माला भी लेकर चले।
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उन्होंने कितने ही आश्रम खोज डाले, पर रैक्व का पता न चला। किसी ने बताया कि वह एक मामूली झोपड़ी में हैं। वहां जाकर देखा, तो एक बूढ़ा गाड़ीवान गाड़ी के पास बैठा दाद खुजला रहा था। पूछने पर उसने बतलाया, हां, मैं ही रैक्व हूं।
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राजा जानश्रुति रैक्व के पास पहुंचे। उनसे निवेदन किया, आपकी सेवा के लिए कुछ करना चाहता हूं। इससे पहले राजा ने साथ लाए उपहार उनसे स्वीकार करने का निवेदन भी किया था। रैक्व ने उन सब चीजों की उपेक्षा कर दी थी। उन्होंने उन भेंटों को लेने से इन्कार कर दिया।
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फिर भी जानश्रुति ने रैक्व से कुछ भेंट स्वीकार करने या जरूरत की चीजें ले लेने का आग्रह किया। रैक्व कुछ पल तो जानश्रुति की ओर चुपचाप देखते रहे। फिर बोले, हो सके, तो थोड़ा परे हट जाओ। तुम सूरज की उस धूप के रास्ते में बाधक बने हुए हो, जो मुझ तक आ रही थी। थोड़ी धूप आने दो।
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जानश्रुति अपनी जगह से हट गए। उनकी दृष्टि में फिर भी याचक भाव था। जानश्रुति ने फिर कहा, तुम जहां खड़े हो, वहां से बाधा है। परे हटो। ब्रह्मविद्या कहीं बेचने और खरीदने की वस्तु हुआ करती है? उसके लिए पात्रता विकसित करो।
इसके बाद राजा जानश्रुति से रैक्व ने कई सवाल किए। भांति-भांति से परीक्षा ली। तरह तरह से कसौटियों पर कसा और पाया कि जानश्रुति आत्मतत्व के अधिकारी हैं। सभी कसौटियों पर खरा उतरने के बाद ही रैक्व ऋषि ने जानश्रुति को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया।