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गुरू ने किया वह हाल, शिष्य ने कहा नहीं बनना चेला

Mon, 30 Jun 2014 12:21 PM IST
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
प्रभुदत्त ब्रह्मचारी Updated Mon, 30 Jun 2014 12:21 PM IST
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come then, when wind began to come more important

ऋषि चैतन्य अपने आश्रम के किनारे बह रही नदी के तट पर ध्यानमग्न थे। आसपास कई और शिष्य भी ध्यान कर रहे थे। तभी एक युवक उस आश्रम में आया। नदी किनारे बने एक घाट पर उसने ऋषि को सुखासन से बैठे परमात्मा में चित्त लगाते देखा।

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उसे इतना भी धैर्य न रहा कि ऋषि के ध्यान से बाहर आने का इंतजार करता। अधीर चित्त से वह ऋषि से कह उठा, गुरुदेव, मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूं। निवेदन करते ही ऋषि ने तत्काल आंखें खोल दीं और पूछा, क्यों? युवक ने उत्तर देने में एक पल भी नहीं लगाया और बोल उठा, क्योंकि मैं ईश्वर को पाना चाहता हूं।
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उत्तर इस तेजी से आया, जैसे युवक इसके लिए तैयार होकर ही आया हो। उसने जिस तत्परता से उत्तर दिया, उससे भी ज्यादा तत्परता ऋषि की ओर से आई। उन्होंने उछलकर युवक का गिरेबान पकड़ा और युवक का सिर नदी में डुबो दिया। युवक खुद को बचाने के लिए छटपटाता रहा, पर ऋषि की पकड़ बहुत मजबूत थी।
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कुछ देर उसका सिर पानी में डुबाए रखने के बाद उन्होंने उसे छोड़ दिया। युवक ने जोर-जोर से खांसने लगा। खांसते-खांसते किसी तरह वह अपनी सांस पर काबू पा सका। ऋषि ने इस बीच तीन-चार बार पुकार कर पूछा, आओ तुम्हें ईश्वर को पाने का उपाय बता दूं।


बार बार पूछने के बाद पर युवक ने खीझते हुए कहा, अभी सांस तो लेने दो गुरुदेव। ऋषि मुस्कराए और युवक के सहज होने पर बोले, जब तुम्हारा सिर पानी के भीतर था, तब तुम्हें किस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हो रही थी?

युवक ने कहा, हवा की। ऋषि ने कहा, तुम अभी अपने घर जाओ और वापस तभी आना, जब तुम्हें ईश्वर की भी वैसी ही जरूरत महसूस हो।

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