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Rath Saptami 2020: रथ सप्तमी पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा
Sat, 01 Feb 2020 10:40 AM IST
रुस्तम राणा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: रुस्तम राणा
Updated Sat, 01 Feb 2020 10:40 AM IST
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Rath Saptami 2020
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रथ सप्तमी सूर्योपसना का पर्व है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को रथ सप्तमी के नाम से जाना जाता है। इस बार यह तिथि एक फरवरी को पड़ रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान भास्कर यानी सूर्यदेव की साधना-आराधना का अक्षय फल मिलता है। सच्चे मन से की गई साधना से प्रसन्न होकर भगवान भास्कर अपने भक्तों को सुख-समृद्धि एवं अच्छी सेहत का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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रथ सप्तमी के हैंं कई नाम
रथ सप्तमी को विभिन्न नामों से जाना जाता है। माघ शुक्ल सप्तमी के कारण इसे माघी सप्तमी, अचला सप्तमी आरोग्य सप्तमी, रथ आरोग्य सप्तमी और अर्क सप्तमी के नाम से जाना जाता है।
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रथ सप्तमी का मुहूर्त (Ratha Saptami 2020 Muhurat)
माघ शुक्ल सप्तमी तिथि प्रारंभ - 31 जनवरी 2020, शनिवार 15:50 बजे से
माघ शुक्ल सप्तमी तिथि का अंत - 01 फरवरी 2020, रविवार 18:08 बजे तक
रथ सप्तमी की पूजा विधि
थ सप्तमी के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करके उगते हुए सूर्य का दर्शन एवं उन्हें 'ॐ घृणि सूर्याय नम:' कहते हुए जल अर्पित करें।
सूर्य की किरणों को लाल रोली, लाल फूल मिलाकर जल दें।
सूर्य को जल देने के पश्चात् लाल आसन में बैठकर पूर्व दिशा में मुख करके इस मंत्र का 108 बार जप करें
''एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणाध्र्य दिवाकर।
रथ सप्तमी की पौराणिक कथा
रथ सप्तमी या माघी सप्तमी की कथा पुराणों में इस प्रकार दी गई है। कहा जाता है कि एक गणिका नाम की महिला ने अपने पूरे जीवन में कभी कोई दान-पुण्य का कार्य नहीं किया था। जब उस महिला का अंत काल आया तो वह वशिष्ठ मुनि के पास गई। महिला ने मुनि से कहा कि मैंने कभी भी कोई दान-पुण्य नहीं किया है तो मुझे मुक्ति कैसे मिलेगी। मुनि ने कहा कि माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अचला सप्तमी है। इस दिन किसी अन्य दिन की अपेक्षा किया गया दान-पुण्य का हजार गुना प्राप्त होता है। इस दिन पवित्र नदि में स्नान करके भगवान सुर्य को जल दें और दीप दान करना चाहिए और दिन में एक बार बिना नमक के भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है। गणिका ने वशिष्ठ मुनि द्वारा बताई हर बात का सप्तमी के दिन व्रत और विधि पूर्वक कार्य किया। कुछ दिन बाद गणिका ने शरीर त्याग दिया और उसे स्वर्ग के राजा ईंद्र की अप्सराओं का प्रधान बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
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