पितृपक्ष 2026: श्राद्ध के समय करें पितृ निवारण स्तोत्र और पितृ कवच का पाठ, दूर होंगे दोष
Pitru Stotra And Kavach Path In Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष का समय पितरों को प्रसन्न और पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए खास माना जाता है। इस समय किए गए श्राद्ध से परिवार में सुख-समृद्धि और खुशियां बनी रहती हैं।
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Pitru Stotra And Kavach Path In Pitru Paksha 2026: पितृपक्ष पितरों को समर्पित विशेष अवधि होती है, जिसमें पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तर्पण और दान-दक्षिणा जैसे धार्मिक कार्य किए जाते हैं। मान्यता है कि, यह समय पितृ दोष से मुक्ति पाने और पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए बेहद शुभ होता है। ऐसे में इस दौरान श्राद्ध कर्म के साथ पंचबलि कर्म करना भी विशेष फलदायी माना जाता है। पितृपक्ष में नए शुभ कार्यों और धार्मिक यात्राओं से बचने की परंपरा भी है। वहीं, इस अवधि में पितृ निवारण स्तोत्र और पितृ कवच का पाठ करना शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इनके नियमित पाठ से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही, पितृ दोष से जुड़ी परेशानियां दूर होने और परिवार में सुख-शांति बनी रहने की मान्यता है। ऐसे में आइए इन्हें जानते हैं।
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ॥
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ॥
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि: ॥
प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥
नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥
अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ॥
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ॥
तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज: ॥
॥ इति पितृ स्त्रोत समाप्त ॥
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कृणुष्व पाजः प्रसितिम् न पृथ्वीम् याही राजेव अमवान् इभेन।
तृष्वीम् अनु प्रसितिम् द्रूणानो अस्ता असि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः॥
तव भ्रमासऽ आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः।
तपूंष्यग्ने जुह्वा पतंगान् सन्दितो विसृज विष्व-गुल्काः॥
प्रति स्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायु-र्विशोऽ अस्या अदब्धः।
यो ना दूरेऽ अघशंसो योऽ अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत्॥
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या-तनुष्व न्यमित्रान् ऽओषतात् तिग्महेते।
यो नोऽ अरातिम् समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यत सं न शुष्कम्॥
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याधि अस्मत् आविः कृणुष्व दैव्यान्यग्ने।
अव स्थिरा तनुहि यातु-जूनाम् जामिम् अजामिम् प्रमृणीहि शत्रून्।