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Mahashivratri 2026: जानिए शिवलिंग के प्राकट्य, शिव की महत्ता और केतकी पुष्प को श्राप की कथा

Sat, 14 Feb 2026 02:48 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Sat, 14 Feb 2026 02:48 PM IST
सार

Mahashivratri 2026:  15 फरवरी, रविार को महाशिवरात्रि है। इस दिन भगवान भोलेनाथ की विशेष रूप से पूजा आराधना चार प्रहर की जाती है। ऐसी मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का प्राकट्य हुआ था। 

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Mahashivratri 2026 Know Why We Celebrate Shivratri Kyon Manai Jati hai Shivratri Know Lord Shiva Significance
Mahashivratri 2026 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Mahashivratri 2026: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि सनातन धर्म का अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस रात्रि भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग रूप में प्राकट्य हुआ था। इसी कारण यह रात्रि साधना, तप और शिव-भक्ति के लिए विशेष फलदायी मानी गई है। वर्ष 2026 में 15 फरवरी को यह पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा।

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महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व
पुराणों में वर्णित है कि महाशिवरात्रि की रात्रि में व्रत, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र जप और चार प्रहर की पूजा करने से शिव कृपा सहज प्राप्त होती है। शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, भस्म और धतूरा अर्पित करना कल्याणकारी माना गया है। यह पर्व केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प भी है।
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केतकी पुष्प का वर्जित होने की कथा
केतकी पुष्प के संबंध में जो कथा प्रचलित है, उसका उल्लेख शिव पुराण तथा अन्य आगम ग्रंथों में मिलता है। कथा के अनुसार एक बार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। तभी एक अनंत अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ, जो भगवान शिव का दिव्य ज्योतिर्लिंग स्वरूप था। उस स्तंभ का न आदि था न अंत। भगवान विष्णु वराह रूप लेकर नीचे की ओर गए और ब्रह्मा हंस रूप धारण कर ऊपर की ओर उड़े। विष्णु ने स्वीकार किया कि वे अंत तक नहीं पहुँच सके। किंतु ब्रह्मा को भी शिखर नहीं मिला। उसी समय उन्हें मार्ग में केतकी का पुष्प मिला, जो उस ज्योति-स्तंभ से नीचे गिर रहा था। ब्रह्मा ने केतकी से आग्रह किया कि वह साक्षी दे दे कि वे शिखर तक पहुँच गए हैं। केतकी ने असत्य का साथ दिया।
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जब दोनों देवता वापस आए तो ब्रह्मा ने झूठी गवाही प्रस्तुत की। तब शिवजी प्रकट हुए और उन्होंने सत्य को उद्घाटित किया। असत्य बोलने और अहंकार के कारण शिवजी ने क्रोधित होकर अपने रौद्र रूप कालभैरव को प्रकट किया। कालभैरव ने ब्रह्मा का पंचम सिर काट दिया। इसीलिए ब्रह्मा चतुर्मुख कहलाए। यह प्रसंग अहंकार के दंड और सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है।। साथ ही केतकी पुष्प को भी श्राप दिया कि वह शिव पूजा में कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा।


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सत्य और नम्रता का संदेश
महाशिवरात्रि की यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक संदेश भी देती है। भगवान शिव ‘सत्य’ और ‘तत्वज्ञान’ के प्रतीक हैं। जो व्यक्ति अहंकार त्यागकर सत्य का मार्ग अपनाता है, वही शिवकृपा का पात्र बनता है।
अतः महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का अभिषेक करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि शिव भक्ति का मूल आधार आडंबर नहीं, बल्कि सच्चाई, विनम्रता और निष्कपट श्रद्धा है। 

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