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Govatsa Dwadashi 2025: संतान सुख और समृद्धि का पर्व बछ बारस कल, जानिए इसका महत्व और नियम

Tue, 19 Aug 2025 12:13 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 19 Aug 2025 12:13 PM IST
सार

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला बछ बारस, जिसे गोवत्स द्वादशी भी कहा जाता है, इसी क्रम में एक प्रमुख पर्व है। यह व्रत विशेष रूप से गौमाता और बछड़ों (वत्स) को समर्पित होता है।

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Govatsa Dwadashi 2025 Date Time Importance Significance Puja Vidhi
Govatsa Dwadashi 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Govatsa Dwadashi 2025: सनातन धर्म में वर्ष भर अनेक व्रत और पर्व मनाए जाते हैं, जिनका संबंध लोककल्याण और परिवार की समृद्धि से जुड़ा होता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाने वाला बछ बारस, जिसे गोवत्स द्वादशी भी कहा जाता है, इसी क्रम में एक प्रमुख पर्व है। यह व्रत विशेष रूप से गौमाता और बछड़ों (वत्स) को समर्पित होता है। ग्रामीण अंचलों में इसे अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि 19 अगस्त, मंगलवार की दोपहर 03 बजकर 32 मिनिट से शुरू होगी जो 20 अगस्त, बुधवार की दोपहर 01 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। यानी द्वादशी तिथि का सूर्योदय 20 अगस्त को होगा, इसलिए इसी दिन ये व्रत किया जाएगा।

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धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यता है कि द्वादशी तिथि भगवान विष्णु को अति प्रिय है। इस दिन व्रती गौमाता और बछड़े की पूजा करके संतान सुख, परिवार की उन्नति और घर में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इसे संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाने वाला व्रत माना जाता है। शास्त्रों में वर्णन है कि इस दिन बछड़े और गाय की पूजा करने से समस्त पाप नष्ट होते हैं और गौमाता की कृपा से जीवन में ऐश्वर्य, स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति होती है। बछ बारस का संबंध विशेष रूप से संतान की मंगलकामना से भी है। मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से संतान रोगमुक्त, दीर्घायु और कुल की परंपरा को आगे बढ़ाने वाली होती है।
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क्या करें 
गौमाता की पूजा करें- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और गौमाता व बछड़े को स्नान कराकर फूल, रोली, अक्षत, दूर्वा और दीप अर्पित करें।
व्रत का पालन करें- इस दिन व्रती केवल फलाहार करते हैं और अन्न-भोजन से परहेज रखते हैं।
भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की आराधना करें- विष्णु सहस्रनाम या गीता के श्लोकों का पाठ करें।
दान-पुण्य करें- जरूरतमंदों को दही, दूध, फल, अनाज अथवा दक्षिणा का दान करें।
संतान की दीर्घायु की कामना करें- माता-पिता इस दिन अपने बच्चों के मंगल हेतु विशेष प्रार्थना करते हैं।

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क्या न करें
दूध से बने व्यंजन न खाएं- इस दिन दूध, दही, घी, मक्खन, छाछ आदि का सेवन वर्जित माना गया है, क्योंकि यह दिन गौवंश को समर्पित है।
गाय-बछड़े को कष्ट न दें- इस दिन ही नहीं बल्कि हर दिन गाय को मारना-पीटना अथवा उन्हें भूखा रखना बड़ा पाप माना गया है।
झूठ, चोरी और कपट से बचें- व्रत का फल तभी पूर्ण मिलता है जब मन, वचन और कर्म से पवित्रता बरती जाए।
अन्न ग्रहण न करें- व्रती को इस दिन अन्न का परित्याग करना चाहिए और केवल फलाहार से ही दिन व्यतीत करना चाहिए।
अशुभ कार्य न करें- इस दिन व्रत तोड़ना, अनादर करना अथवा गौमाता की अवहेलना करना दुर्भाग्य को बुलाने वाला माना गया है।

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