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Hindi News ›   Spirituality ›   Festivals ›   Ganga Dussehra 2023 shri ganga stotram Lyrics

Ganga Dussehra 2023: गंगा दशहरा पर जरूर करें पवित्र गंगा स्तोत्रम का पाठ, मिलेगा शुभ फल

Sun, 21 May 2023 03:36 PM IST
आशिकी पटेल धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आशिकी पटेल Updated Sun, 21 May 2023 03:36 PM IST
सार

Ganga Dussehra 2023: हर साल ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इस दिन विधि-विधान से मां गंगा की पूजा की जाती है। इस साल 30 मई को गंगा दशहरा का पावन पर्व मनाया जाएगा।

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Ganga Dussehra 2023 shri ganga stotram Lyrics
गंगा दशहरा पर जरूर करें पवित्र गंगा स्तोत्रम का पाठ - फोटो : iStock

विस्तार

Ganga Dussehra 2023: हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इस दिन विधि-विधान से मां गंगा की पूजा की जाती है। इस साल 30 मई को गंगा दशहरा का पावन पर्व मनाया जाएगा। गंगा दशहरा के दिन गंगा मां की पूजा करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन गंगा नदी में स्नान का बहुत ज्यादा महत्व होता है, लेकिन यदि आप इस दिन गंगा नदी में स्नान करने का पुण्य लाभ नहीं ले पा रहे हैं तो घर पर ही पानी में गंगा जल डालकर स्नान करें और पवित्र गंगा स्तोत्रम का पाठ करें। यह स्तोत्र आपको कई गुना अधिक फल देगा। 
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पवित्र गंगा स्तोत्रम
 
देवि सुरेश्वरि भगति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे ।
शंकरमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ।।1।।
 
भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यात: ।

नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम ।।2।।
 
हरिपदपाद्यतरंगिणि गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे ।

दूरीकुरू मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम ।।3।।
 
तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम ।
मातर्गंगे त्वयि यो भक्त: किल तं द्रष्टुं न यम: शक्त: ।।4।।
 
पतितोद्धारिणि जाह्रवि गंगे खण्डितगिरिवरमण्डितभंगे ।
भीष्मजननि हेमुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ।।5।।
 
कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।
पारावारविहारिणि गंगे विमुखयुवतिकृततरलापांगे ।।6।।
 
तव चेन्मात: स्रोत: स्नात: पुनरपि जठरे सोsपि न जात: ।
नरकनिवारिणि जाह्रवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे ।।7।।
 
पुनरसदड़्गे पुण्यतरंगे जय जय जाह्रवि करूणापाड़्गे ।
इन्द्रमुकुट मणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ।।8।।
 
रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम ।
त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ।।9।।
 
अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।
तव तटनिकटे यस्य निवास: खलु वैकुण्ठे तस्य निवास: ।।10।।
 
वरमिह: नीरे कमठो मीन: कि वा तीरे शरट: क्षीण: ।
अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीन: ।।11।।
 
भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।
गंगास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो य: सजयति सत्यम ।।12।।
 
येषां ह्रदये गंगाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुख मुक्ति: ।
मधुराकान्तापंझटिकाभि: परमानन्द कलितललिताभि:
 
गंगास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम ।
शंकरसेवकशंकरचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्त: ।।

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